पटना। बिहार विधान परिषद चुनाव के बीच एक बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम सामने आया है। राष्ट्रीय लोक मोर्चा (रालोमो) प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा के बेटे और पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश के मंत्री पद पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। भाजपा द्वारा विधान परिषद चुनाव के लिए उम्मीदवारों की सूची जारी किए जाने के बाद दीपक प्रकाश के उच्च सदन में पहुंचने की संभावनाएं लगभग समाप्त मानी जा रही हैं, जिससे उनके मंत्री पद पर भी खतरा पैदा हो गया है।
सूत्रों के अनुसार, अंतिम समय में उपेंद्र कुशवाहा और भाजपा नेतृत्व के बीच राजनीतिक सहमति नहीं बन सकी। भाजपा ने अपने कोटे की चारों विधान परिषद सीटों के लिए उम्मीदवारों की घोषणा कर दी, लेकिन दीपक प्रकाश को जगह नहीं मिली। इसके बाद राजनीतिक गलियारों में उनके जल्द मंत्री पद से इस्तीफा देने की चर्चाएं तेज हो गई हैं।
इस बीच एक महत्वपूर्ण संकेत तब मिला, जब दीपक प्रकाश ने अपने फेसबुक प्रोफाइल और बायोग्राफी से मंत्री पद से संबंधित उल्लेख हटा दिया। राजनीतिक हलकों में इसे संभावित इस्तीफे की तैयारी के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है।

गौरतलब है कि दीपक प्रकाश 7 मई को दूसरी बार मंत्री बने थे, लेकिन वह न तो विधानसभा के सदस्य हैं और न ही विधान परिषद के। संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार किसी भी मंत्री को छह महीने के भीतर किसी एक सदन का सदस्य बनना आवश्यक होता है। ऐसे में विधान परिषद का रास्ता बंद होने के बाद उनके सामने विकल्प सीमित हो गए हैं।
सियासी सूत्रों का दावा है कि भाजपा नेतृत्व ने दीपक प्रकाश को विधान परिषद भेजने के लिए उपेंद्र कुशवाहा के समक्ष कुछ शर्तें रखी थीं, लेकिन उन पर सहमति नहीं बन पाई। इसके बाद दोनों पक्षों के बीच बातचीत बेनतीजा रही और मामला आगे नहीं बढ़ सका।
अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि दीपक प्रकाश कब औपचारिक रूप से मंत्री पद से इस्तीफा देते हैं। यह घटनाक्रम एनडीए की अंदरूनी राजनीति और सहयोगी दलों के बीच शक्ति संतुलन को लेकर भी कई नए सवाल खड़े कर रहा है।
@MUSKAN KUMARI






