नई दिल्ली/पटना,
भारतीय राजनीति में एक बार फिर बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। राष्ट्रपति ने वरिष्ठ पत्रकार और राज्यसभा के उपसभापति Harivansh Narayan Singh को दोबारा राज्यसभा के लिए नामित कर दिया है। इस फैसले के बाद दिल्ली से लेकर पटना तक राजनीतिक हलचल तेज हो गई है और नए सियासी समीकरणों पर चर्चा शुरू हो गई है।
हरिवंश का मौजूदा कार्यकाल 9 अप्रैल को समाप्त हो गया था और इस बार Janata Dal (United) ने उन्हें औपचारिक टिकट नहीं दिया था। ऐसे में उनके संसदीय भविष्य को लेकर अटकलें लगाई जा रही थीं, लेकिन राष्ट्रपति के नामांकन ने सभी कयासों पर विराम लगा दिया।
संविधान के अनुच्छेद 80 के तहत राष्ट्रपति को साहित्य, विज्ञान, कला और सामाजिक सेवा जैसे क्षेत्रों में विशेष योगदान देने वाले 12 व्यक्तियों को Rajya Sabha के लिए नामित करने का अधिकार है। इसी प्रावधान के तहत हरिवंश को एक बार फिर उच्च सदन में जगह मिली है।
हरिवंश नारायण सिंह पहली बार 2014 में जदयू के समर्थन से राज्यसभा पहुंचे थे और 2018 में उपसभापति चुने गए। 2020 में उन्हें दोबारा इस पद की जिम्मेदारी सौंपी गई। संसदीय कार्यवाही को संतुलित और सुचारु रूप से संचालित करने में उनकी भूमिका अहम रही है।
दिलचस्प यह भी है कि Nitish Kumar के करीबी माने जाने वाले हरिवंश ने बदलते राजनीतिक समीकरणों के बावजूद अपने संवैधानिक पद को बनाए रखा। जब जदयू ने एनडीए से दूरी बनाई थी, तब भी उन्होंने उपसभापति पद से इस्तीफा देने से इनकार किया था, यह कहते हुए कि यह पद राजनीतिक नहीं, बल्कि संवैधानिक है।
नए संसद भवन के उद्घाटन के दौरान उनकी उपस्थिति और Narendra Modi द्वारा सार्वजनिक सराहना ने भी उनके राजनीतिक रुख को लेकर बहस को जन्म दिया था।
राष्ट्रपति के इस नामांकन को न केवल हरिवंश की व्यक्तिगत उपलब्धि माना जा रहा है, बल्कि इसे इस संकेत के रूप में भी देखा जा रहा है कि राष्ट्रीय राजनीति में उनके अनुभव और भूमिका को अभी भी बेहद अहम माना जा रहा है।
@MUSKAN KUMARI






