स्व-निर्धारित लैंगिक पहचान का अधिकार हटाने पर विपक्ष का तीखा विरोध, मेडिकल बोर्ड की भूमिका अनिवार्य
नई दिल्ली:
संसद ने ट्रांसजेंडर पर्सन्स (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स) संशोधन विधेयक, 2026 को पारित कर दिया है, जिससे देशभर में एक नई बहस छिड़ गई है। लोकसभा से मंजूरी मिलने के बाद राज्यसभा ने भी इसे ध्वनि मत से पास कर दिया।
इस संशोधन का सबसे विवादित पहलू यह है कि अब “स्व-निर्धारित लैंगिक पहचान” (Self-Determination of Gender) को कानूनी मान्यता से हटा दिया गया है। नए प्रावधानों के तहत “ट्रांसजेंडर व्यक्ति” की परिभाषा को सीमित किया गया है और इसमें “self-perceived gender identity” को बाहर कर दिया गया है।
अब किसी व्यक्ति को ट्रांसजेंडर पहचान प्रमाणपत्र पाने के लिए जिला मजिस्ट्रेट के साथ-साथ मेडिकल बोर्ड की सिफारिश अनिवार्य होगी। पहले यह प्रक्रिया केवल स्वयं के शपथ-पत्र (affidavit) के आधार पर पूरी हो जाती थी और किसी मेडिकल जांच की जरूरत नहीं होती थी।
संशोधन में यह भी प्रावधान किया गया है कि जेंडर-अफर्मिंग सर्जरी के बाद व्यक्ति को पुनः आवेदन करना होगा और संबंधित मेडिकल संस्थान को उसकी जानकारी प्रशासन को देनी होगी।
इसके अलावा, जबरन किसी व्यक्ति या बच्चे को ट्रांसजेंडर पहचान अपनाने के लिए मजबूर करने पर सख्त सजा का प्रावधान किया गया है। वयस्क के मामले में न्यूनतम 10 साल की सजा और 2 लाख रुपये जुर्माना, जबकि बच्चों के मामले में आजीवन कारावास और 5 लाख रुपये जुर्माना तय किया गया है।
विपक्ष का विरोध तेज
विपक्षी नेताओं ने इस विधेयक को ट्रांसजेंडर समुदाय के अधिकारों के खिलाफ बताया है। कांग्रेस सांसद रेणुका चौधरी ने सवाल उठाया कि जब आम नागरिक अपनी लैंगिक पहचान स्वयं घोषित कर सकते हैं, तो ट्रांसजेंडर समुदाय पर मेडिकल जांच क्यों थोप दी जा रही है।
टीएमसी सांसद साकेत गोखले ने सरकार पर बिना प्रभावित समुदाय से परामर्श किए कानून बनाने का आरोप लगाया और इसे “औपनिवेशिक सोच” करार दिया। वहीं, शिवसेना (यूबीटी) की प्रियंका चतुर्वेदी ने कहा कि मेडिकल बोर्ड के जरिए पहचान तय करना व्यक्ति की गरिमा के अधिकार का उल्लंघन है।
चिंता और सवाल
विपक्ष का कहना है कि नए प्रावधानों से ट्रांसजेंडर समुदाय के लिए पहचान प्राप्त करना और कठिन हो जाएगा, जिससे वे मुख्यधारा से और दूर हो सकते हैं। साथ ही “undue influence” जैसे शब्दों के दुरुपयोग की आशंका भी जताई जा रही है।
इस विधेयक के पारित होने के बाद अब यह देखना अहम होगा कि इसका सामाजिक और कानूनी प्रभाव क्या पड़ता है, और क्या यह वास्तव में संरक्षण देगा या नए विवादों को जन्म देगा।
@MUSKAN KUMARI







