बिहार के गया जिले के फतेहपुर प्रखंड में मुहर्रम केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि गंगा-जमुनी तहजीब, सामाजिक सौहार्द और आपसी भाईचारे की अनूठी मिसाल बन चुका है। यहां करीब 60 गांवों में हिंदू परिवार कई पीढ़ियों से पूरे सम्मान और आस्था के साथ मुहर्रम की परंपरा निभाते आ रहे हैं। खास बात यह है कि इनमें कई ऐसे गांव भी शामिल हैं, जहां एक भी मुस्लिम परिवार नहीं रहता, फिर भी हर वर्ष ताजिया निकालकर मुहर्रम मनाया जाता है।
गदहियाटांड़, जेहलीबीघा, बहेरा, मोरवे, मतासो, कोड़या, भगवानपुर, खजूरी, केंदुआ, रक्सी, सतनियां, केवाल, सलैयाखुर्द, राजाबीघा, पतेया, पकरिया, जसपुर और मेयारी सहित कई गांवों में हिंदू परिवार ताजिया बनवाते हैं और पारंपरिक तरीके से मुहर्रम का आयोजन करते हैं। गांवों के लोग पूरे उत्साह के साथ ताजिया जुलूस में भाग लेते हैं और वर्षों पुरानी परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं।
इन गांवों में पूर्वजों द्वारा बनवाए गए इमामबाड़े आज भी मौजूद हैं। मुहर्रम के दौरान यहां फातिहा और अन्य धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, जिनके लिए मौलानाओं को आमंत्रित किया जाता है ताकि सभी धार्मिक परंपराएं विधिवत संपन्न हो सकें।
इस वर्ष फतेहपुर प्रखंड में मुहर्रम के अवसर पर 103 समितियों ने लाइसेंस के लिए आवेदन किया है। पिछले वर्ष 106 लाइसेंस जारी किए गए थे, जिनमें लगभग 60 लाइसेंस हिंदू परिवारों और समितियों के नाम पर थे। यह इस पर्व में सभी समुदायों की साझा भागीदारी और सामाजिक समरसता का प्रतीक है।
पतेया गांव के नरेश पंडित बताते हैं कि उनके गांव में कोई मुस्लिम परिवार नहीं रहता, लेकिन पूर्वजों की मन्नत और परंपरा के कारण उनका परिवार हर साल मुहर्रम मनाता है। वहीं, गदहियाटांड़ गांव के रोहन राजवंशी का कहना है कि ताजिया निर्माण से लेकर जुलूस तक पूरे गांव के लोग मिलकर आयोजन को सफल बनाते हैं। यह परंपरा आज भी सामाजिक एकता और सांप्रदायिक सौहार्द का संदेश दे रही है।
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