पटना। बिहार में अपराध और रंगदारी की कहानी सिर्फ अपहरण और फिरौती तक सीमित नहीं रही। 1990 के दशक में डॉक्टरों, कारोबारियों, व्यापारियों और संपन्न परिवारों के अपहरण को लेकर बिहार की पहचान बनी। उस दौर में अपराध का सीधा मॉडल था—निशाना तय करो, अपहरण करो, फिरौती मांगो और पैसा मिलने के बाद पीछे हट जाओ। 1991 की एक रिपोर्ट ने बिहार में अपहरण को संगठित और नकदी आधारित अपराध के रूप में दर्ज किया था।
2000 के दशक की शुरुआत में अपराध के इस मॉडल में एक और परत जुड़ने लगी। विकास और सरकारी परियोजनाओं में आने वाला बड़ा पैसा अपराधियों के लिए नया लक्ष्य बनने लगा। 2002 में India Today ने बिहार में विकास परियोजनाओं को प्रभावित करने और उनसे रंगदारी वसूलने को एक उभरती हुई समस्या के रूप में रिपोर्ट किया था। उसी दौर में CPWD के ठेकेदार की हत्या के बाद सरकारी निर्माण के ठेकों पर आपराधिक प्रभाव को लेकर भी रिपोर्ट सामने आई।
2005 के बाद बदलता बिहार और बदलता अपराध
2005 में नीतीश कुमार के नेतृत्व में सरकार बनने के बाद कानून-व्यवस्था सुधारने और सड़क-बिजली-पुल जैसी बुनियादी सुविधाओं के विस्तार पर जोर दिया गया। सड़क निर्माण और दूसरे इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट तेजी से आगे बढ़े।
लेकिन विकास के साथ एक नया आर्थिक लक्ष्य भी सामने आया—करोड़ों रुपये के सरकारी कॉन्ट्रैक्ट।
अपराधियों ने कई इलाकों में ठेकेदारों और निर्माण कंपनियों से कथित तौर पर रंगदारी मांगनी शुरू की। मांग पूरी नहीं होने पर निर्माण कार्य रोकने, मशीनों को नुकसान पहुंचाने, कर्मचारियों को धमकाने और हिंसा की घटनाएं सामने आईं।
जनवरी 2007 में मदेपुरा में सड़क निर्माण कंपनी से जुड़े दो इंजीनियरों की हत्या के बाद बिहार पुलिस ने सड़क परियोजनाओं के कैंप और साइटों पर सुरक्षा बढ़ाने के निर्देश दिए। तत्कालीन पुलिस रिकॉर्ड और मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, दोनों इंजीनियरों पर करीब एक करोड़ रुपये की रंगदारी देने का दबाव था और मांग पूरी नहीं होने पर उन पर हमला किया गया।
रोहतास में गोल्डन क्वाड्रिलेटरल परियोजना से जुड़े एक कर्मचारी की हत्या और एक अन्य मामले में निर्माण मशीन जलाए जाने की घटना ने भी सरकार के सामने बड़ी चुनौती खड़ी की। पुलिस को सड़क परियोजनाओं के कैंपों और कर्मचारियों की सुरक्षा के लिए विशेष व्यवस्था करनी पड़ी।
ठेकेदार से रंगदारी… फिर प्रोजेक्ट पर कब्जे की कोशिश
यहां अपराध का मॉडल सिर्फ पैसा मांगने तक सीमित नहीं था।
कई मामलों में सवाल यह बन गया कि किसे ठेका मिलेगा, कौन काम करेगा और किसकी हिस्सेदारी होगी?
यानी अपराधी केवल ठेकेदार से पैसा मांगने वाले नहीं रहना चाहते थे। सरकारी निर्माण के बड़े कामों में अपनी आर्थिक हिस्सेदारी बनाने की कोशिश भी सामने आई।
2007 की एक रिपोर्ट में बिहार के सड़क निर्माण क्षेत्र में सक्रिय तथाकथित “रोड माफिया” पर कई इंजीनियरों और ठेकेदारों को निशाना बनाने के आरोपों का उल्लेख किया गया था। उसी रिपोर्ट में सड़क निर्माण के बड़े सरकारी ठेकों को लेकर आपराधिक प्रभाव की चर्चा हुई।
2004 में ही सामने आया था बड़ा खतरा
इस अपराधी मॉडल का एक महत्वपूर्ण उदाहरण 2004 में भी देखने को मिला था।
NHPC से जुड़े दो वरिष्ठ इंजीनियरों का अपहरण हुआ। दोनों अधिकारी बिहार की ग्रामीण सड़क कनेक्टिविटी से जुड़े बड़े प्रोजेक्ट पर काम कर रहे थे। रिपोर्टों में आशंका जताई गई कि इस घटना का असर हजारों करोड़ रुपये के ग्रामीण सड़क और बिजली प्रोजेक्टों पर पड़ सकता है।
इसी दौर में पटना के डॉक्टर एन.के. अग्रवाल की हत्या और उन्हें पहले मिले रंगदारी के नोटों का मामला भी सामने आया। यानी पुराने अपहरण-रंगदारी मॉडल और नए प्रोजेक्ट आधारित अपराध—दोनों एक ही समय में मौजूद थे।
2015: सड़क परियोजना और दो इंजीनियरों की हत्या
दिसंबर 2015 में दरभंगा के बहेड़ी में सड़क निर्माण परियोजना से जुड़े दो इंजीनियरों—मुकेश कुमार सिंह और ब्रजेश कुमार—की हत्या ने एक बार फिर पूरे देश का ध्यान बिहार की ओर खींचा।
मीडिया रिपोर्टों में पुलिस जांच के हवाले से कहा गया कि दोनों को कथित तौर पर एक करोड़ रुपये की रंगदारी की मांग से जोड़ा गया था। यह मामला कथित तौर पर संतोष झा गिरोह से जुड़ा था।
इसके बाद सड़क और पुल परियोजनाओं पर काम करने वाली कंपनियों में सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ी। 15 निर्माण कंपनियों के प्रतिनिधियों ने भी राज्य सरकार के सामने लगातार मिल रही धमकियों और रंगदारी की शिकायतों को उठाया।
और इसी दौर में अपराध के हथियारों का चेहरा भी बदलता दिखा। बिहार पुलिस ने AK-47 जैसे अत्याधुनिक हथियारों के इस्तेमाल को लेकर चिंता जताई। Indian Express की 2017 की रिपोर्ट के अनुसार, दिसंबर 2015 में दरभंगा के दो निर्माणकर्मियों की हत्या के बाद बिहार में स्थानीय अपराधियों द्वारा AK-47 के इस्तेमाल का मुद्दा पुलिस के लिए विशेष चिंता बना।
अपराध का नया अर्थशास्त्र
बिहार की अपराध कहानी को अगर तीन चरणों में देखें तो तस्वीर कुछ ऐसी बनती है—
पहला दौर:
डॉक्टर, कारोबारी और संपन्न परिवार → अपहरण → फिरौती।
दूसरा दौर:
ठेकेदार, निर्माण कंपनियां और बड़े कारोबारी → रंगदारी → काम रोकने की धमकी।
तीसरा दौर:
बड़े सड़क-पुल और सरकारी प्रोजेक्ट → ठेकेदारों पर दबाव → कर्मचारियों और इंजीनियरों को निशाना → प्रोजेक्ट की सुरक्षा पर सीधा असर।
इस बदलाव ने अपराध को केवल व्यक्ति के खिलाफ होने वाला अपराध नहीं रहने दिया। इसका असर सरकारी काम, निर्माण की लागत, प्रोजेक्ट की समयसीमा और कर्मचारियों की सुरक्षा तक पहुंचने लगा।
सवाल सिर्फ रंगदारी का नहीं, सिस्टम का भी है
सबसे बड़ा सवाल यही है कि करोड़ों रुपये की परियोजनाओं में अपराधी नेटवर्क अपनी जगह कैसे बनाते हैं?
कौन ठेका हासिल करता है?
किसे काम करने दिया जाता है?
किस इलाके में कौन गैंग सक्रिय है?
रंगदारी की रकम कहां तक जाती है?
और अगर कोई ठेकेदार पैसा देने से इनकार करता है तो उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी है?
इन सवालों के जवाब केवल पुलिस कार्रवाई से नहीं मिलते। इसके लिए टेंडर प्रक्रिया, ठेका व्यवस्था, स्थानीय आपराधिक नेटवर्क, राजनीतिक संरक्षण के आरोपों और प्रशासनिक तंत्र—सभी की पड़ताल जरूरी है।
2000 के दशक में सड़क निर्माण परियोजनाओं पर हमलों के बाद बिहार पुलिस ने खुद प्रोजेक्ट साइटों की सुरक्षा बढ़ाने के निर्देश दिए थे। इससे यह स्पष्ट होता है कि समस्या को उस समय कानून-व्यवस्था के गंभीर मुद्दे के रूप में देखा जा रहा था।
बिहार फाइल्स का सवाल
बिहार में अपराधियों ने सिर्फ अपना ठिकाना नहीं बदला, अपराध की अर्थव्यवस्था भी बदली।
जहां कभी फिरौती के लिए किसी डॉक्टर या कारोबारी का अपहरण किया जाता था, वहीं बाद के वर्षों में करोड़ों रुपये के सड़क, पुल और निर्माण प्रोजेक्ट अपराधियों के लिए आर्थिक लक्ष्य बनने लगे।
लेकिन असली सवाल आज भी वही है—क्या सरकारी विकास परियोजनाओं में अपराधी नेटवर्क की आर्थिक हिस्सेदारी को पूरी तरह खत्म किया जा सका है?
यही है बिहार फाइल्स की अगली पड़ताल।
Author: Noida Desk
मुख्य संपादक (Editor in Chief)






