पटना हाईकोर्ट ने घरेलू बिजली उपभोक्ताओं को बड़ी राहत देते हुए बिजली कानून की धारा 135 के तहत दर्ज एक प्राथमिकी को रद्द कर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि महज बिजली बिल का बकाया रह जाना या समय पर बिल जमा नहीं करना अपने आप में बिजली चोरी का अपराध साबित नहीं करता।
जस्टिस जितेंद्र कुमार की एकल पीठ ने मो. शाहिद इमाम की याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि धारा 135 के तहत आपराधिक मामला बनाने के लिए बिजली चोरी के साथ उपभोक्ता की बेईमानी की मंशा (Dishonest Intention) भी साबित करना जरूरी है।
मामले में बिजली विभाग ने करीब 5.39 लाख रुपये का बकाया होने के कारण कनेक्शन काटे जाने के बाद कथित रूप से अनधिकृत बिजली इस्तेमाल करने के आरोप में धारा 135 के तहत प्राथमिकी दर्ज की थी। उपभोक्ता ने इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी।

अदालत ने धारा 135 और धारा 126 के बीच अंतर समझाते हुए कहा कि अनधिकृत बिजली उपयोग के मामलों में धारा 126 के तहत सिविल कार्रवाई और बकाया राशि की वसूली की जा सकती है। लेकिन आपराधिक कार्रवाई के लिए बिजली चोरी और उसके पीछे मौजूद बेईमान मंशा का आधार स्थापित करना जरूरी है।
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसले का हवाला देते हुए प्राथमिकी निरस्त कर दी। फैसले से साफ है कि बिजली बिल का बकाया और बिजली चोरी दो अलग-अलग कानूनी स्थितियां हैं।
@MUSKAN KUMARI






