नई दिल्ली,
भारत के पूर्वोत्तर राज्य से एक खास समुदाय के 250 लोग लंबा सफर तय कर तेल अवीव पहुंच गए हैं—घूमने के लिए नहीं, बल्कि हमेशा के लिए बसने। यह समुदाय खुद को प्राचीन काल की उस “खोई हुई जाति” का वंशज मानता है, जिसका उल्लेख बाइबिल में मिलता है।
गुरुवार, 23 अप्रैल को बनेई मेनाशे समुदाय के ये लोग तेल अवीव एयरपोर्ट पहुंचे, जहां उनका गर्मजोशी से स्वागत किया गया। नीले-सफेद गुब्बारों और पारंपरिक यहूदी गीतों के बीच लोगों ने गाकर, झंडे लहराकर और नाचकर इस पल को खास बना दिया।
“बनेई मेनाशे” का अर्थ है “मेनाशे के बेटे”। यह समुदाय खुद को प्राचीन इस्राएली जनजाति से जुड़ा मानता है। इजरायल सरकार की एक योजना के तहत इन्हें धीरे-धीरे वहां बसाया जा रहा है। नवंबर में लिए गए फैसले के बाद यह पहला जत्था है, जिसके तहत करीब 4,600 लोगों को बसाने की प्रक्रिया शुरू की गई है।
इस समुदाय के अधिकांश लोग मणिपुर से आते हैं। वर्षों से वे अपने ऐतिहासिक और धार्मिक जुड़ाव के आधार पर इजरायल में बसने की मांग कर रहे थे।
शावेई इजरायल नामक संस्था इस प्रक्रिया में अहम भूमिका निभा रही है। संस्था के अनुसार, 1990 के दशक से अब तक करीब 4,000 बनेई मेनाशे इजरायल जा चुके हैं, जबकि लगभग 7,000 लोग अभी भी भारत में रह रहे हैं।
समुदाय की मान्यता है कि उनके पूर्वजों ने सदियों पहले फारस, अफगानिस्तान, तिब्बत और चीन होते हुए पलायन किया। इस लंबी यात्रा के बावजूद उन्होंने यहूदी परंपराओं—जैसे खतना—को बनाए रखा।
यह घटना सिर्फ एक प्रवास नहीं, बल्कि पहचान, आस्था और इतिहास से जुड़ने की एक भावनात्मक यात्रा के रूप में देखी जा रही है—जहां लोग अपनी जड़ों की ओर लौट रहे हैं।
@MUSKAN KUMARI






