केरल में चुनाव नतीजों से पहले सियासी पारा चढ़ा हुआ है, लेकिन इस बार मुकाबला सिर्फ सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच नहीं, बल्कि कांग्रेस के भीतर भी नजर आ रहा है। कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ में मुख्यमंत्री पद को लेकर शुरू हुई अंदरूनी खींचतान ने पार्टी की मुश्किलें बढ़ा दी हैं।
राज्य में 9 अप्रैल को मतदान हो चुका है और अब 4 मई को नतीजों का इंतजार है। करीब एक दशक बाद सत्ता में वापसी की उम्मीद लगाए यूडीएफ खेमे में उत्साह तो है, लेकिन नेतृत्व को लेकर उठी बहस ने माहौल को असहज बना दिया है।
केरल की राजनीति में लंबे समय तक हर चुनाव में सत्ता बदलने की परंपरा रही है, लेकिन 2021 में सीपीआई (एम) के नेतृत्व वाले वाम लोकतांत्रिक मोर्चे ने लगातार दूसरी बार सरकार बनाकर इस परंपरा को तोड़ दिया था। ऐसे में इस बार का चुनाव कांग्रेस और यूडीएफ के लिए बेहद अहम माना जा रहा है।
इसी बीच कांग्रेस के भीतर मुख्यमंत्री पद को लेकर दावेदारी खुलकर सामने आने लगी है। वरिष्ठ नेता रमेश चेन्निथला, विपक्ष के नेता वी डी सतीशान और संगठन महासचिव के सी वेणुगोपाल के समर्थक अपने-अपने नेता के पक्ष में बयान दे रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनाव परिणाम से पहले इस तरह की बयानबाजी मतदाताओं के बीच गलत संदेश दे सकती है। वरिष्ठ मीडिया आलोचक एम एन करासेरी ने इसे शर्मनाक बताते हुए कहा कि सत्ता मिलने से पहले पद की लड़ाई जनता के भरोसे को कमजोर कर सकती है।
इस विवाद का असर सहयोगी दलों पर भी दिखने लगा है। इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के नेता पी अब्दुल हमीद ने कांग्रेस की आलोचना करते हुए कहा कि मुख्यमंत्री पद को लेकर इस तरह की सार्वजनिक चर्चा से कार्यकर्ताओं का मनोबल गिर सकता है।
हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि पार्टी हाईकमान का जो भी फैसला होगा, सभी उसे स्वीकार करेंगे। उन्होंने भरोसा जताया कि राहुल गांधी केरल की राजनीति को अच्छी तरह समझते हैं और अंतिम निर्णय सोच-समझकर लिया जाएगा।
दूसरी ओर, वाम दलों ने इस विवाद पर चुप्पी साधते हुए एकजुटता का संदेश देने की कोशिश की है। इसके उलट कांग्रेस में गुटबाजी खुलकर सामने आने से कार्यकर्ताओं और सहयोगी दलों में बेचैनी बढ़ गई है। ऐसे में चुनाव नतीजों से पहले यूडीएफ के सामने सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष से नहीं, बल्कि अपने ही घर की अंदरूनी कलह बनती दिख रही है।
@MUSKAN KUMARI







