सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला समेत धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के प्रवेश पर सुनवाई तेज

9 जजों की संविधान पीठ कर रही समीक्षा; कोर्ट का सवाल—क्या आस्था के नाम पर भेदभाव सही?

नई दिल्ली: में केरल के समेत विभिन्न धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के प्रवेश और कथित भेदभाव से जुड़े मामलों पर सुनवाई जारी है। इसके लिए 9 न्यायाधीशों की संविधान पीठ गठित की गई है, जो 2018 के फैसले के खिलाफ दायर समीक्षा याचिकाओं पर विचार कर रही है।

सुनवाई के दौरान जस्टिस ने अहम टिप्पणी करते हुए पूछा कि अगर किसी आस्थावान भक्त को देवता को छूने से रोका जाता है, तो क्या ऐसे में संविधान उसकी रक्षा के लिए आगे नहीं आएगा? यह सवाल उस बहस के बीच उठा, जिसमें यह मुद्दा केंद्र में है कि क्या जन्म या परंपरा के आधार पर किसी को पूजा-अधिकार से वंचित किया जा सकता है।

मंदिर के प्रमुख पुजारी की ओर से दलील दी गई कि पूजा-पद्धति और परंपराएं धर्म का अभिन्न हिस्सा हैं और इन्हें धार्मिक अधिकार के रूप में संरक्षित किया जाना चाहिए। उनके अनुसार, मंदिर आने वाले श्रद्धालुओं को वहां की परंपराओं को स्वीकार करना होता है।

इस मामले के साथ अदालत के तहत धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े व्यापक सवालों पर भी विचार कर रही है। इनमें मस्जिदों और दरगाहों में मुस्लिम महिलाओं के प्रवेश, अंतरधार्मिक विवाह के बाद पारसी महिलाओं के अग्नि मंदिर में प्रवेश, बहिष्कार की प्रथाओं की वैधता और में महिला जननांग विकृति से जुड़े मुद्दे शामिल हैं।

मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने सुनवाई का शेड्यूल तय किया है। समीक्षा याचिकाओं के समर्थन में दलीलें 7 से 9 अप्रैल तक, विरोधी पक्ष की दलीलें 14 से 16 अप्रैल तक सुनी गईं, जबकि जवाबी दलीलें 21 अप्रैल को और एमिकस क्यूरी की अंतिम बहस 22 अप्रैल तक पूरी होने की संभावना है।

ने अदालत से धर्म की समुदाय-केंद्रित व्याख्या अपनाने की अपील की है। वहीं, सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि केंद्र सरकार इन समीक्षा याचिकाओं का समर्थन करती है।

@MUSKAN KUMARI

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Author: NCRLOCALDESK

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