Supreme Court of India ने सबरीमाला समेत धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े मामलों की सुनवाई के दौरान हिंदू धर्म को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। शीर्ष अदालत ने कहा कि हिंदू धर्म केवल पूजा-पाठ या धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने का तरीका है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति के हिंदू बने रहने के लिए मंदिर जाना या विशेष धार्मिक कर्मकांड करना जरूरी नहीं है।
मुख्य न्यायाधीश Surya Kant की अध्यक्षता वाली नौ-न्यायाधीशों की संविधान पीठ धार्मिक स्वतंत्रता, महिलाओं के धार्मिक स्थलों में प्रवेश और विभिन्न समुदायों की धार्मिक प्रथाओं से जुड़े मामलों की सुनवाई कर रही है। इनमें Sabarimala Temple में महिलाओं के प्रवेश का मामला और दाऊदी बोहरा समुदाय से जुड़े मुद्दे भी शामिल हैं।
संविधान पीठ में न्यायमूर्ति B. V. Nagarathna, एम एम सुंदरेश, अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, अरविंद कुमार, ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, प्रसन्ना बी वराले, आर महादेवन और जॉयमाल्या बागची शामिल हैं।

“दीपक जलाना भी आस्था का प्रमाण”
सुनवाई के दौरान एक हस्तक्षेपकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता G. Mohan Gopal ने कहा कि धार्मिक समुदायों के भीतर से सामाजिक न्याय की मांग उठ रही है। उन्होंने अदालत के समक्ष यह भी कहा कि 1966 के एक फैसले में हिंदू धर्म को वेदों को सर्वोच्च मानने वालों से जोड़ा गया था, लेकिन आज हर हिंदू ऐसा नहीं मानता।
इस पर न्यायमूर्ति बी वी नागरत्ना ने टिप्पणी करते हुए कहा कि यही कारण है कि हिंदू धर्म को “जीवन जीने का तरीका” कहा जाता है। उन्होंने कहा कि किसी हिंदू के लिए मंदिर जाना या अनुष्ठान करना अनिवार्य नहीं है। व्यक्ति की आस्था उसके निजी विश्वास से तय होती है और कोई भी उसके विश्वास के मार्ग में बाधा नहीं डाल सकता।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने भी अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि कोई व्यक्ति अपनी झोपड़ी में दीपक जलाता है, तो वही उसकी आस्था और धर्म को साबित करने के लिए पर्याप्त है।
धार्मिक स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों पर चर्चा
सुनवाई के दौरान अदालत ने धार्मिक परंपराओं और संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन पर भी चर्चा की। कोर्ट ने कहा कि यदि हर धार्मिक प्रथा और परंपरा को संवैधानिक अदालत में चुनौती दी जाने लगे, तो सभी धर्मों से जुड़ी बड़ी संख्या में याचिकाएं सामने आएंगी।
गौरतलब है कि वर्ष 2018 में सबरीमाला मंदिर मामले में पांच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने 4:1 के बहुमत से फैसला सुनाते हुए 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के मंदिर में प्रवेश पर लगी रोक को असंवैधानिक करार दिया था। उस फैसले के बाद धार्मिक स्वतंत्रता, समानता और परंपराओं को लेकर देशभर में व्यापक बहस शुरू हुई थी।
@MUSKAN KUMARI





