बागपत। न्यायिक व्यवस्था और लंबित मुकदमों की धीमी रफ्तार को उजागर करने वाला एक अनोखा मामला उत्तर प्रदेश के बागपत जिले से सामने आया है। करीब 27 वर्षों तक अदालत के चक्कर लगाने वाले 80 वर्षीय बुजुर्ग को आखिरकार राहत मिली, लेकिन यह राहत अपने साथ एक प्रतीकात्मक सजा भी लेकर आई। अदालत ने उन्हें जेल भेजने के बजाय 24 घंटे तक कोर्ट परिसर में खड़े रहने की सजा और एक हजार रुपये का जुर्माना लगाया।
मामला वर्ष 1999 का है। बागपत जिले के सरूरपुर कलां गांव निवासी धारा सिंह ने अपने ग्रामीण प्रतिद्वंद्वी राजेंद्र सिंह और दो अन्य लोगों के खिलाफ गाली-गलौज और जान से मारने की धमकी देने का मुकदमा दर्ज कराया था। आरोप था कि विवाद के दौरान राजेंद्र सिंह ने शिकायतकर्ता को धमकाया था। पुलिस जांच के बाद मामला अदालत पहुंचा और कानूनी प्रक्रिया शुरू हुई।
समय बीतता गया, लेकिन मामले का निपटारा नहीं हो सका। इस दौरान 100 से अधिक सुनवाई हुईं और राजेंद्र सिंह लगातार अदालत में पेश होते रहे। बढ़ती उम्र और कमजोर स्वास्थ्य के बावजूद वह मुकदमे का बोझ उठाते रहे। हाल के दिनों में तबीयत खराब होने के कारण जब वह अदालत में पेश नहीं हो सके, तो उनके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किया गया और संपत्ति कुर्की की प्रक्रिया भी शुरू कर दी गई।

आखिरकार मामला मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत पहुंचा, जहां 80 वर्षीय राजेंद्र सिंह ने अपने ऊपर लगे आरोप को स्वीकार करते हुए उम्र और बीमारी का हवाला देकर नरमी की अपील की। अदालत ने उनकी वृद्धावस्था और स्वास्थ्य स्थिति को देखते हुए उन्हें जेल की सजा से राहत प्रदान की, लेकिन कानून की गरिमा बनाए रखने के लिए 24 घंटे की प्रतीकात्मक सजा और एक हजार रुपये का जुर्माना लगाया।
फैसले के बाद भावुक राजेंद्र सिंह ने कहा कि 27 वर्षों तक मुकदमे का बोझ ढोना आसान नहीं था। हर तारीख उनके लिए एक नई परेशानी लेकर आती थी। उन्होंने अदालत का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि अब इस मामले के समाप्त होने से उन्हें और उनके परिवार को बड़ी राहत मिली है।
यह मामला न केवल एक व्यक्ति की लंबी कानूनी लड़ाई की कहानी है, बल्कि देश में वर्षों तक लंबित रहने वाले मुकदमों और न्याय मिलने में होने वाली देरी पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है। 27 साल बाद आया यह फैसला न्यायिक प्रक्रिया की धीमी गति की तस्वीर भी पेश करता है।
@MUSKAN KUMARI





