सीटों में 50% बढ़ोतरी के आश्वासन के बावजूद दक्षिणी राज्यों को नुकसान की आशंका
महिला आरक्षण विधेयक, जिसे नारी शक्ति वंदन अधिनियम के नाम से भी जाना जाता है, एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में है। लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं में 33 फीसदी महिला आरक्षण के प्रावधान पर विपक्ष ने समर्थन जताया है, लेकिन परिसीमन (डिलिमिटेशन) को लेकर गंभीर आपत्तियां उठाई हैं।
विपक्ष का आरोप है कि परिसीमन प्रक्रिया के जरिए उत्तर भारत के राज्यों—जैसे उत्तर प्रदेश और बिहार—की लोकसभा सीटों में बड़ा इजाफा हो सकता है, जबकि दक्षिण भारतीय राज्यों को नुकसान झेलना पड़ सकता है। हालांकि केंद्र सरकार ने इन आशंकाओं को खारिज करते हुए स्पष्ट किया है कि सभी राज्यों की सीटों में समान रूप से 50 फीसदी की बढ़ोतरी की जाएगी और मौजूदा अनुपात बरकरार रहेगा।
दक्षिण भारत के कई प्रमुख नेताओं ने इस मुद्दे पर चिंता जताई है। रेवंत रेड्डी, एम.के. स्टालिन और नवीन पटनायक ने आशंका जताई है कि परिसीमन के बाद उनके राज्यों की सीटों में कमी आ सकती है।
सूत्रों के अनुसार, केंद्र सरकार लोकसभा सीटों की कुल संख्या बढ़ाकर करीब 850 करने की योजना पर काम कर रही है। इसमें लगभग 815 सीटें राज्यों के लिए और 35 सीटें केंद्र शासित प्रदेशों के लिए निर्धारित की जा सकती हैं। यह वृद्धि मौजूदा संख्या में लगभग 50 प्रतिशत इजाफा होगी, जिससे हर राज्य की सीटों में समान रूप से बढ़ोतरी का दावा किया जा रहा है।
परिसीमन आयोग का गठन भारत के राष्ट्रपति द्वारा किया जाता है। यह आयोग भारत निर्वाचन आयोग के साथ मिलकर काम करता है। आयोग में आमतौर पर सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश को अध्यक्ष बनाया जाता है, जबकि मुख्य चुनाव आयुक्त और उनके द्वारा नामित एक अन्य आयुक्त सदस्य होते हैं।
सरकार का कहना है कि 2011 की जनगणना के आधार को बाध्यकारी नहीं बनाया जाएगा, ताकि राज्यों के बीच सीटों के अनुपात में कोई असंतुलन न हो। हालांकि, विपक्ष इस मुद्दे पर और स्पष्टता की मांग कर रहा है, जिससे आने वाले समय में इस पर सियासी बहस और तेज होने की संभावना है।
@MUSKAN KUMARI







