बिहार के सरकारी अस्पतालों के लिए कथित तौर पर ऊंची कीमत पर डस्टबिन खरीद का मामला अब सियासी विवाद से निकलकर जांच के दायरे में पहुंच गया है। स्वास्थ्य विभाग से जुड़ी इस खरीद को लेकर उठे सवालों के बीच स्वास्थ्य मंत्री निशांत कुमार ने मामले की उच्चस्तरीय जांच के आदेश दिए हैं।
मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, जांच की जिम्मेदारी वरिष्ठ अधिकारी त्यागराजन को सौंपी गई है। अब जांच में यह स्पष्ट होने की उम्मीद है कि जिन सामानों को लेकर सवाल उठ रहे हैं, वे वास्तव में सामान्य प्लास्टिक डस्टबिन थे या विशेष तकनीकी क्षमता वाले मेडिकल वेस्ट ट्रीटमेंट उपकरण।
₹11 हजार से ₹15,490 तक की कीमत पर सवाल
मामले की शुरुआत आरटीआई से सामने आई खरीद संबंधी जानकारियों और उसके बाद मीडिया में आई रिपोर्टों से हुई। रिपोर्टों में दावा किया गया कि अस्पतालों के लिए 45 लीटर क्षमता वाले कंटेनर करीब 11 हजार रुपये और 75 लीटर क्षमता वाले कंटेनर करीब 15,490 रुपये की दर से खरीदे गए।
इन कीमतों की तुलना बाजार में उपलब्ध सामान्य प्लास्टिक डस्टबिन से किए जाने के बाद खरीद प्रक्रिया और सरकारी राशि के इस्तेमाल को लेकर सवाल उठने लगे। हालांकि जांच पूरी होने से पहले यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि सरकारी धन का दुरुपयोग हुआ है।

BMSICL ने दिया तकनीकी पक्ष
विवाद के बीच बिहार मेडिकल सर्विसेज एंड इन्फ्रास्ट्रक्चर कॉर्पोरेशन लिमिटेड (BMSICL) का कहना है कि इन कंटेनरों की तुलना सामान्य घरेलू प्लास्टिक डस्टबिन से करना सही नहीं है।
BMSICL के अनुसार, ये कंटेनर अस्पतालों में इस्तेमाल होने वाली माइक्रोवेव आधारित मेडिकल वेस्ट ट्रीटमेंट व्यवस्था का हिस्सा हैं। विभागीय पक्ष के मुताबिक, इन्हें विशेष तकनीकी जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है और ये मेडिकल वेस्ट प्रबंधन में उपयोग किए जाते हैं। इसी तकनीकी विशेषता के कारण इनकी कीमत सामान्य डस्टबिन से अधिक होने का तर्क दिया गया है।
जांच में किन सवालों के जवाब तलाशे जाएंगे?
उच्चस्तरीय जांच में टेंडर और खरीद प्रक्रिया से जुड़े कई महत्वपूर्ण बिंदुओं की पड़ताल की जा सकती है, जिनमें—
•खरीदे गए उत्पाद का वास्तविक नाम और तकनीकी स्पेसिफिकेशन क्या था?
•क्या ये सामान्य प्लास्टिक डस्टबिन थे या विशेष मेडिकल वेस्ट कंटेनर?
•इनकी कीमत तय करने का तकनीकी और वित्तीय आधार क्या था?
•बाजार में उपलब्ध समान तकनीकी उत्पादों की कीमत कितनी थी?
•टेंडर प्रक्रिया में कितनी कंपनियों ने हिस्सा लिया?
•सप्लायर का चयन किस प्रक्रिया के तहत किया गया?
•अस्पतालों में इन उपकरणों का वास्तविक उपयोग हुआ या नहीं?
•भुगतान किन शर्तों और दरों के आधार पर किया गया?
इन सवालों के जवाब से ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि मामला विशेष तकनीकी उपकरणों की महंगी खरीद का है या खरीद प्रक्रिया में कोई वित्तीय अथवा प्रक्रियागत अनियमितता हुई।

जदयू नेता श्याम जी वर्मा ने जांच का किया स्वागत
मामले पर जदयू नेता श्याम जी वर्मा ने कहा कि स्वास्थ्य विभाग से जुड़ी किसी भी खरीद में पारदर्शिता सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि सरकारी राशि खर्च हुई है तो उसके हर रुपये का स्पष्ट हिसाब जनता के सामने होना चाहिए।
उनका कहना है कि अगर खरीदे गए कंटेनर वास्तव में विशेष मेडिकल वेस्ट ट्रीटमेंट उपकरण हैं तो उनकी तकनीकी गुणवत्ता, स्पेसिफिकेशन, खरीद दर और बाजार में उपलब्ध समान उत्पादों की कीमत का तुलनात्मक विवरण सार्वजनिक किया जाना चाहिए। वहीं, यदि जांच में किसी प्रकार की अनियमितता सामने आती है तो जिम्मेदारी तय कर कार्रवाई की जानी चाहिए।
आरोप बनाम सफाई, अब जांच रिपोर्ट पर टिकी निगाहें
इस पूरे विवाद में एक तरफ खरीद की दर को लेकर गंभीर सवाल हैं, तो दूसरी तरफ BMSICL का तकनीकी पक्ष है कि यह सामान्य कूड़ेदान नहीं, बल्कि मेडिकल वेस्ट ट्रीटमेंट सिस्टम का विशेष कंटेनर है।
अब निगाहें उच्चस्तरीय जांच रिपोर्ट पर टिकी हैं। जांच में यदि विभाग का दावा सही पाया जाता है और खरीद प्रक्रिया तकनीकी मानकों व नियमों के अनुरूप पाई जाती है, तो विवाद पर स्थिति स्पष्ट हो सकती है। वहीं, यदि टेंडर, कीमत निर्धारण, आपूर्ति या भुगतान में अनियमितता सामने आती है तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई का रास्ता खुल सकता है।
फिलहाल अंतिम निष्कर्ष जांच पूरी होने के बाद ही सामने आएगा।
@MUSKAN KUMARI





