रंगमंच के समर्पित साधक गणेश प्रसाद सिन्हा की स्मृति को समर्पित नाटक ‘सुरमा’ का मंचन

25 सितम्बर 2026|| बिहार के वरिष्ठ रंगकर्मी, एवं कला जागरण के संस्थापक अध्यक्ष स्व.गणेश सिन्हा की स्मृति में रंग-स्मरणांजलि का आयोजन आज प्रेमचंद रंगशाला,राजेन्द्र नगर,पटना में किया गया। कार्यक्रम का आरम्भ स्व. गणेश सिन्हा पर आधारित वृतचित्र “अनहद स्वर:गणेश सिन्हा” का प्रदर्शन किया गया | निर्माण एवं प्रस्तुति डा.किशोर सिन्हा की थी | इस अवसर पर गणेश सिन्हा नाट्य रूपांतरित सुरमा नाटक का मंचन गया| सआदत हसन मंटो का उर्दू अफसाना नाटक सुरमा को परिकल्पित और निर्देशित बिहार के वरिष्ठ रंगकर्मी सुमन कुमार ने किया है| इस नाटक में अर्चना एंजल,महिमा, विष्णुदेव कुमार, धीरज कुमार,युगल किशोर सिन्हा, मुस्कान शर्मा, सुरूची कुमारी,सूरज कुमार,नागेन्द्र कुमार सहित सभी कलाकारों ने बेहद प्रभावशाली अभिनय किया| मंच परे मुख्य गायक चन्दन कुमार एवं हरि कृष्ण सिंह” मुन्ना “ का नाल पर सुबोध राजा एवं शहनाई पर मो.अबरेज आलम ने साथ दिया| प्रकाश राजीव कुमार, वीडियो एवं ध्वनि प्रभाव अरविन्द कुमार तथा सौरभ कुमार का था| रूप सज्जा अंजु कुमारी तथा मंच सज्जा विनय कुमार ने की| वस्त्र विन्यास रीना कुमारी, प्रस्तुति नियंत्रक रोहित कुमार तथा इस आयोजन को सफल बनाने में अखिलेश्वर प्रसाद सिन्हा, एवं डा.किशोर सिन्हा ने मार्गदर्शन प्रदान किया|
सआदत हसन मंटो का नाटक ‘सुरमा’ एक माँ के प्रेम, मातृत्व और अपने बच्चे को खोने के बाद उसके भीतर पैदा हुए गहरे दुःख की मार्मिक कहानी है। नाटक की मुख्य पात्र फहमी अपने बच्चे से बेहद प्यार करती है। बच्चे की मृत्यु उसके जीवन को पूरी तरह बदल देती है। वह इस सदमे को स्वीकार नहीं कर पाती और धीरे-धीरे अपना मानसिक संतुलन खोने लगती है।फहमी लगातार अपने बच्चे की यादों में डूबी रहती है। परिवार के लोग उसकी हालत को देखकर उसके इलाज के बारे में सोचते हैं और उसे आगरा ले जाने की बात तय होती है। लेकिन आगरा ले जाने से पहले ही उसकी मानसिक स्थिति इतनी बिगड़ जाती है कि वह अपने आसपास की वास्तविकता से लगभग पूरी तरह कट जाती है।इसी दौरान वह काले सुरमे और काजल जैसी काली राख को अपने चेहरे पर, शरीर पर और घर की दीवारों तक पर लगाने लगती है। वह सुरमा हर जगह फैला देती है। यह दृश्य उसके भीतर चल रहे दुःख और उसके मानसिक रूप से टूट जाने को बहुत गहराई से दिखाता है। सुरमा यहाँ केवल एक वस्तु नहीं रह जाता, बल्कि उसके मातृत्व, उसकी यादों और उसके बिखरते हुए मन का प्रतीक बन जाता है।फहमी को आगरा ले जाने की तैयारी

और चर्चा के बीच ही उसकी हालत और बिगड़ती जाती है और अंततः उसी अवस्था में अपने ससुराल में उसकी मृत्यु हो जाती है।‘सुरमा’ एक ऐसी माँ की कहानी है जिसके लिए अपने बच्चे को खोना केवल एक दुखद घटना नहीं, बल्कि उसके पूरे अस्तित्व का टूट जाना है। मंटो इस नाटक के माध्यम से मातृत्व, शोक और मानसिक टूटन को बेहद संवेदनशील और मार्मिक ढंग से प्रस्तुत करते हैं।

Noida Desk
Author: Noida Desk

मुख्य संपादक (Editor in Chief)

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