भारतीय राजनीति में Gen Z को लेकर राजनीतिक और वैचारिक संगठनों की सक्रियता बढ़ती दिखाई दे रही है। RSS प्रमुख मोहन भागवत के हालिया इंटरव्यू और स्वतंत्रता दिवस के बाद संघ के प्रचारकों द्वारा युवाओं से सीधे संवाद की प्रस्तावित कवायद ने इस चर्चा को और तेज कर दिया है।
इंटरनेट और सोशल मीडिया के दौर में पली-बढ़ी Gen Z पारंपरिक राजनीतिक निष्ठाओं के बजाय रोजगार, शिक्षा, शासन, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, सामाजिक न्याय और पारदर्शिता जैसे मुद्दों पर ज्यादा जोर देती है। ऐसे में संघ का युवाओं के बीच जाकर उनकी राय और अपेक्षाएं जानने का प्रयास उसकी पारंपरिक कार्यशैली में बदलाव के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है।
इस संवाद के जरिए संघ यह समझने की कोशिश कर सकता है कि युवाओं के बीच सरकार की नीतियों और मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था को लेकर क्या सोच है। रोजगार, करियर की अनिश्चितता, डिजिटल अर्थव्यवस्था, पर्यावरण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे मुद्दे इस पीढ़ी की प्राथमिकताओं में शामिल हैं।

इसका असर बीजेपी की राजनीति पर भी पड़ सकता है। पिछले एक दशक से बीजेपी की चुनावी रणनीति में युवा मतदाता अहम भूमिका में रहे हैं। ऐसे में संघ के संवाद से सामने आने वाला फीडबैक पार्टी के लिए भी महत्वपूर्ण हो सकता है। हालांकि, यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि संघ की यह पहल सीधे तौर पर बीजेपी की नीतियों में बदलाव का आधार बनेगी।
दरअसल, Gen Z के साथ संवाद की कवायद सिर्फ चुनावी राजनीति नहीं, बल्कि वैचारिक निरंतरता से भी जुड़ी है। नई पीढ़ी को पारंपरिक तरीकों से जोड़ने के बजाय उसकी बात सुनना और उसके सवालों को समझना किसी भी वैचारिक संगठन के लिए बड़ी चुनौती है।
अब देखना होगा कि संघ और Gen Z के बीच होने वाला यह संवाद किस तरह की तस्वीर सामने लाता है और क्या इसका असर आने वाले वर्षों में बीजेपी और व्यापक भारतीय राजनीति की रणनीति पर दिखाई देता है।
@MUSKAN KUMARI





