पर्यटन : एफिल टावर है पेरिस की पहचान

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फ्रांस की अपनी भाषा में पारि कहलाने वाला पेरिस विश्व के सुंदरतम, सुव्यवस्थित और मनोरम शहरों में से एक है। इस स्वप्न नगरी के बीचों-बीच बहती है सीन नदी और उसके एक तट पर स्थित है विश्व विख्यात एफिल टावर। पेरिस अपनी सदियों पुरानी ऐतिहासिक इमारतों के संरक्षण के लिए भी जाना जाता है। इस नगरी से साक्षात्कार का स्वप्न साकार हुआ जब हमारी बस ने ब्रिटेन में इंगलिश चैनल को पार कर फ्रांस में प्रवेश किया।

राजधानी पेरिस संपूर्ण विश्व के लोगों के दिलों में एक खास स्थान रखता है। आज से लगभग तीस वर्ष पूर्व दिल्ली के तालकटोरा में जब मैंने फ्रैंच फेस्टिवल देखा तो तभी से पेरिस को नजदीक से देखने की इच्छा थी। पार्को एवं सड़क के किनारे लगे पेड़ों की कटाई चौरस आकार की देखकर चौंका। ये छटे हुए वृक्ष बहुत आकर्षक प्रतीत हो रहे थे।

विशेष बात यह है कि पेरिसवासियों को अपनी भाषा और संस्कृति का अभिमान है। हर अभिमान बुरा हो, ऐसा जरूरी नहीं है और भाषा या संस्कृति का अभिमान तो बहुत हद तक अच्छा ही है। वे लोग अंग्रेजी में पूछे गए किसी प्रश्न का उत्तर देने की बजाय खामोश रहते हैं या इस तरह घूरते हैं मानो बहुत बड़ा अपराध हो गया हो। उनके इस व्यवहार से हम भारतीय भी सबक ले सकते हैं परन्तु होता इसके ठीक विपरीत है। विदेश में चार दिन रहने के बाद हम भारतीय विदेशी भाषा के ज्यादा दीवाने हो जाते हैं। न जाने ऐसा क्या है कि फ्रांस, रुस, जर्मनी आदि देशों का अपनी भाषा के प्रति लगाव देखकर भी हमारे दिलों में राष्ट्रभाषा के प्रति प्रेम नहीं जागता।

पेरिस के दर्शनीय स्थलों में सबसे पहले एफिल टावर का नाम आता है। नेपोलियन की विजय के प्रतीक स्वरूप बनाए जाने वाले इस टावर के लिए अनेक प्रस्ताव आए लेकिन फ्रांसीसी इंजीनियर एलेक्जेंडर गुस्ताव एफिल द्वारा किये गये डिजाइन को स्वीकारा गया। 985 फुट ऊँचे इस टावर के ठीक नीचे गुस्ताव एफिल की मूर्ति भी लगाई गई है। इस टावर की ऊँचाई 324 मीटर है। इसका निर्माण मात्र 2 वर्ष, 2 महीने और 5 दिन में कर लिया गया था।

रोचक तथ्य यह भी सामने आया कि जर्मनी द्वारा फ्रांस पर हमला और पेरिस पर कब्जा कर लिए जाने के दौरान यहाँ के बहादुर युवाओं ने एफिल टावर की लिफ्ट के तार काट दिए थे ताकि नाजी सेना के लिए अपना झंडा फहराना आसान न हो और उन्हें सीढिय़ाँ चढ़कर जाना पड़े। एफिल टावर के बारे में कहा जाता है कि आरंभ में यह निर्णय किया गया था कि इसे बीस वर्षों बाद हटा दिया जाएगा लेकिन जल्द ही एफिल टावर पेरिस की पहचान बन गया तो इसे हटाने का विचार ही हमेशा के लिए भुला दिया गया।

इस तीन मंजिलें टावर पर जाने के लिए चारों ओर लिफ्ट की सुविधा है। इन दिनों दो लिफ्ट कार्य नहीं कर रही थी इसलिए हमें घंटों इंतजार के बाद ही प्रवेश की अनुमति मिली। वैसे इंतजार काल बोरियत वाला नहीं था। चारों तरफ बहुत कुछ ऐसा घटित हो रहा था जिससे खासा मनोरंजन हो रहा था। चार्ली चैपलिन बने एक युवा ने अपनी हरकतों से सभी का मन जीत लिया। हाँ, बाद में उसने सभी के सामने अत्यन्त विनम्रता से अपनी टोपी भी घुमायी। सभी ने कुछ-न-कुछ देकर उसका उत्साह बढ़ाया।

टावर में प्रवेश की टिकट दो दिन पूर्व भी ऑनलाइन आरक्षित की जा सकती है लेकिन मरम्मत काल में यह सुविधा बंद कर दी गई थी। हर आयु वर्ग के लिए टिकट के दामों में अंतर है जैसे 4 वर्ष से कम बच्चे मुफ्त, 4 से 11 वर्ष के लिए 9.5 यूरो, 12 से 24 के लिए 12.5 और उससे अधिक वालों को 14 यूरो का भुगतान करना पड़ता है। विकलांगों तथा उनके एक सहायक को विशेष छूट दी जाती है। बच्चों के मनोरंजन के लिए अनेक प्रकार के खेल एवं इस टावर के इतिहास से जुड़ी हुए प्रश्नों की प्रतियोगिता भी होती है।

नीचे से प्रथम तल आने वाली लिफ्ट बड़ी है। उसमें 60 लोग आ सकते हैं लेकिन द्वितीय तल से सबसे ऊपर तक जाने वाली लिफ्ट छोटी है जिसमें अधिकतम 10 लोगों के लिए ही स्थान है। एफिल टावर के टॉप पर खड़े होकर मीलों दूर तक का विहंगम दृश्य देखा जा सकता है। लोग दूरबीन लिए पेरिस शहर का नजारा देखने में व्यस्त थे इसलिए ऊपर खासी भीड़ थी। टॉप पर विश्व की प्रसिद्ध इमारतों से उसकी तुलना भी की। इनमें हमारे कुतुब मीनार, ताजमहल, इण्डिया गेट आदि भी शामिल थे। छोटी लिफ्ट के कारण हमारी टीम के सभी सदस्य एक साथ नीचे नहीं आ सके, इसलिए मुझे कुछ इंतजार करना पड़ा।

एक स्थान पर भीड़ देखकर मैं वहाँ पहुँचा तो देखा एक व्यक्ति रंग-बिरंगे खरगोश लिए बैठा है। लोग विशेष रुप से बच्चे उससे घास लेकर खरगोश को खिला रहे थे। कुछ लोग पास रखे पात्रा में सिक्के भी डाल रहे थे। जब तक हमारे सभी साथी नीचे उतरते, हल्का अंधेरा हो चुका थ। एफिल टावर रोशनी से जगमगा उठा तो ‘एन इवनिंग इन पेरिस’ का नजारा देखने वालों में हम भी शामिल थे। उस पल लोहे का वह टावर एक खूबसूरत दृश्य में बदल चुका था।

कनकोर्ड चौक वह स्थान है जहाँ फ्रांस की क्रांति हुई। चारों दिशाओं से आने वाली सड़कों के बीच स्थित चौक पर 3300 वर्ष पुरानी और लगभग 225 टन वजनी एक ऐसी मूर्ति स्थापित है। अठारहवीं सदी में फ्रांस में अत्याचारी लुई सोलहवें के शासनकाल में बैस्तिले एक दुर्ग था जिसे कैदखाने के रूप में इस्तेमाल किया जाता था। 14 जुलाई 1789 को फ्रांसीसी जनता सम्राट के विरुद्ध सड़कों पर उतर आई तथा बैस्तिले के किले को ध्वस्त कर बंदियों को मुक्त करा लिया। इसी घटना से फ्रांसीसी क्रांति की शुरुआत मानी जाती है। बैस्तिले दुर्ग का पतन फ्रांस में राजशाही के अंत व आधुनिक फ्रांस के जन्म का प्रतीक माना जाता है जिससे आगे चलकर फ्रांस के गणतांत्रिक राष्ट्र बनने का मार्ग प्रशस्त हुआ इसीलिए आज भी 14 जुलाई बैस्तिले दिवस अर्थात् फ्रांस के राष्ट्रीय दिवस के रूप में मनाया जाता है।

पेरिस के बारे में कहा जाता हैं कि यह शहर कभी सोता ही नहीं है। पूरी रात यहाँ रास्ते पर लोग आते जाते दिखाई देते हैं। सबसे अधिक सुखद यह है कि लड़कियाँ और महिलाएँ देर रात तक बिना डर या झिझक के अकेले घूम फिर सकती हैं। उन्हें किसी तरह का खतरा या छेड़छाड़ का सामना नहीं करना पड़ता। इसका कारण वहाँ की कानून व्यवस्था है या वहाँ का सामाजिक परिवेश, कहना कठिन है। एक सवाल जो लगातार इस दौरे के दौरान मेरे मन लगातार उठता रहा कि अक्सर कहा जाता है कि नग्नता, सेक्स और मादक पेय इन सारी चीज़ों से अपराध बढ़ते है और जनता ग़लत दिशा की ओर जाती है। लेकिन फ्रांस आदि राष्ट्र उन्नत क्यों है? उन देशों से उपरोक्त सब कुछ चलन में है, फिर भी वहाँ अपराध की दर इतनी कम क्यों है?

ये सोशलिस्ट राष्ट्र हैं और यहाँ के उद्योग और व्यवस्था प्राय: सरकारी है, जहाँ गैर सरकारीकरण की बात चले तो हड़ताल उसका अच्छा जवाब देती है।

समय अभाव के कारण हम बहुत कुछ नहीं देख सके लेकिन इसका कोई अफसोस भी नहीं है क्योंकि जो पाया, वह भी कम नहीं। कुल मिलाकर पेरिस का यह प्रवास यादगार रहा। यहाँ भारतीयों की संख्या बहुत अधिक नहीं है लेकिन भारतीय रेस्टोरेंट ‘भोजनम’ में स्थानीय लोगों की अच्छी खासी उपस्थिति उनके भारत प्रेम का साक्षात प्रमाण था। पंजाब निवासी अमरेन्द्र वर्षों से पेरिस में हैं और भारत के सांस्कृतिक दूत की तरह कार्य कर रहे हैं। उनके रेस्टोरेंट में केवल भारतीय व्यंजन ही नहीं मिलते, भारतीय शिल्पकला का नमूना भी मिलता है। दस्तकारी की वस्तुओं से सजा ‘भोजनम’ अपनी विशिष्ट पहचान रखता है।

स्विट्जरलैंड की ओर कूच करने से पहले हमने पेरिस के एक ऐसे स्थान से एफिल टावर के चित्रा लिए जहाँ उसकी सम्पूर्ण छवि अंकित की जा सकती थी। वास्तविक स्थान से मीलों दूर के इस ‘व्यू प्वाइंट’ पर भी काफी भीड़ थी। सभी यहाँ दुनिया के सात अजूबों में शामिल एफिल टावर संग अपनी फोटो लेकर पेरिस प्रवास को यादगार बनाना चाहते थे।

– डा. विनोद बब्बर

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