तीन दिनी राष्ट्रीय महोत्सव का आज समापन

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रायपुर । साइंस कॉलेज मैदान में तीन दिवसीय चल रहे राष्ट्रीय आदिवासी नृत्य महोत्सव के दूसरे दिन देश और दुनिया से आये आदिवासी कलाकारों के पोशाक और नृत्य को देख मंत्र्मुघ्ध होगये दर्शक। अपनी संस्कृति को बचाये रखना सबकी जिम्मेदारी होती है इस भाव को अपने नृत्यों के माध्यम से आदिवासी कलाकरो ने बयां किया। इतना ही नहीं कार्यक्रम को शुरुआत राजस्थान के गवरी नृत्य से शुरू हुई फिर लगातार गुजरात के डांगी, अंडमान के निकोबारी और तमिलनाडु व उत्तराखंड जैसे राज्यों के साथ ही थाईलैंड और अन्य देश के नृत्यों का सिलसिला देर रात तक जारी रहा वही दर्शको भी इनका उत्साहवर्धन करते रहे और मनमोहक प्रस्तुति का आनदं लिया। इसी बीच जनता से रिश्ता संवादाता ने महोत्सव में प्रस्तुति देने आये हुए भिन्न-भिन्न राज्य और देश के आदिवासी कलाकारों से रूबरू हुए और उनके संस्कृति के बारे में जानने का प्रयास किया।

कर्म देवता को खुश करने बना कर्मा नृत्य 
सात गुंतुनि सातो गाढ़ा सातो सेवा कराय …..इस बोल के साथ छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले स्थित टाटिदाढ़ गॉव से आये आदिवासी कलाकारों द्वारा गाकर जय माता दी कर्मा नृत्य प्रस्तुत किया गया..चेहरे में मासूमियत और अपने संस्कृति के लिए सम्मान यहाँ के कलाकारों के नृत्य से झलक रही थी। इतना ही नहीं सूती के धोती और साड़ी के परिधान और पुरुषो ने जहाँ पगड़ी पहन रखा था तो वही महिलाओ ने अपने बेनी (बालो) पर रिबन के फूल बनाकर सजी हुई थी।इसके साथ ही महिलाओ के गले में चंदवा ,हाथो में मोठा और ऐठी और पैरो में पैरी जैसे गहनो से सजी-धजी महिलाये कर्मा नृत्य को प्रस्तुत किया। यहाँ के लोगो ने बताया यह पराम्परिक नृत्य भाद्रपक्ष के एकादशी से शुरू किया जाता है और दशहरा-दिवाली तक किया जाता है।

चैप्बरूंग ढोल बजाकर नृत्य करते सिक्किम आदिवासी 
भारत देश की विविधता में एकता का नारा को सिद्ध करते है यह अलग-अलग राज्यों से आये कलाकारों के नृत्य। इसी बीच राष्ट्रीय आदिवासी नृत्य महोत्सव में चैप्बरूंग ढोल बजाकर नृत्य करते सिक्किम आदिवासी कलाकार। सर पर ढाका टोपी ,पटाउकी ,अस्कोट ,केसरी , दौराल -सुराल जैसे परिधान को पहनकर केलांगचैप्बरूंग और लिम्बु डांस की प्रस्तुति देते यहाँ के कलाकार। सिक्किम के आदिवसियो ने बताया की यह नृत्य किसी के शादी में किया जाता है या किसी के यहाँ शुभ अवसर हो तब ऐसा उनका मानना है की यह नृत्य की प्रस्तुति करने से शादी कर रहे जोड़े के जीवन में खुशियां आती है और सौभाग्य का प्रतिक होता है। अपनी मनमोहक नृत्य की प्रस्तुति देकर दिल छू लिया।

सिन, सुआ और सोय पोशाक ने खींचा सबका आकर्षण
इस राष्ट्रीय आदिवासी नृत्य में जहाँ एक मंच पर दुनिया के सभी संस्कृति की छटा देखने को मिल रही है तो वही थाईलैंड देश से आये कलाकारों का पोषक देख सब आश्चर्यचकित रह गए। अपने सांस्कृतिक परिधान जिसमे मुख्य रूप से सिन ,सुआ ,और सोय जैसे परिधान को पहनकर वहां नृत्य किया जाता है। इतना ही नहीं यहाँ के आदिवासी कलाकारों ने भू -थाई ,सैम फाओ, और लम पलाइन जैसे नृत्य की प्रस्तुति। यह नृत्य थाईलैंड में रहने वाले तीन जनजातियों का समावेश है। यह आदिवासी पर्वत और जंगलो के बीच रहते है और हर साल 5 दिसंबर को किंग रमा के सामने प्रस्तुत करते है यह नरतिय जिससे राजा और आदिवासी के बीच अच्छे सम्बन्ध बने रहे। इन्होने अपने नृत्य से लड़का और लड़की दोनों बराबर है यह संदेश दिया जिसे देख दर्शको ने तालियां बजाकर सम्मान किया इन कलाकारों का।

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