मुसलमानों के ख़िलाफ़ भड़काने की मंशा नहीं, हम सभी भारतीय हैं : विश्व हिंदू परिषद

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कोरोना वायरस महामारी के समय में देश में मुसलमानों पर हमले और उन्हें अलग-थलग करने की कोशिशें बढ़ी हैं.

सोशल मीडिया पर कई ऐसे वीडियो देखने को मिले हैं जहां मुसलमान रेहड़ी वालों से फल-सब्ज़ी नहीं ख़रीदने की अपील की जा रही है.

यूपी, उत्तराखंड, कर्नाटक, पंजाब सहित कई कोनों से ऐसे मुसलमान-विरोधी वीडियो सामने आ रहे हैं. एक नरेटिव ये भी फैलाया जा रहा है कि ‘मुसलमान कोरोना फैला रहे हैं.’

जमशेदपुर में विश्व हिंदू परिषद के बैनर और नालंदा में बजरंद दल के भगवा झंडों के ज़रिए ठेले वालों को ‘हिंदू दुकान’ का सर्टिफिकेट दिया गया. मामले ने जब तूल पकड़ा तो पुलिस ने इस पर कार्रवाई की. लेकिन हेल्थ इमरजेंसी के इस वक़्त में संप्रदाय का ज़हर क्यों घोला जा रहा है?

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने भी कहा है, ”अगर कोई क्रोध या डर में कुछ उल्टा-सीधा करता है तो सारे समूह को उसमें लपेट कर उससे दूरी बनना ठीक नहीं है.”

लेकिन इसके बावजूद विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल क्यों मामले को संप्रदायिक रंग देने कोशिश कर हैं? ऐसे ही सवालों के साथ बीबीसी संवादादात कीर्ति दूबे ने विश्व हिंदू परिषद के कार्यकारी अध्यक्ष आलोक कुमार से बात की.

वीएचपी इस महामारी को सांप्रदायिक क्यों बना रही है? क्यों झारखंड-बिहार में फलों की रेहड़ियों पर भगवा पोस्टर और झंडे लगाए जा रहे हैं?

आलोक कुमार कहते हैं, हमारे खिलाफ़ लोगों का बायस है. जब 10 हज़ार तब्लीग़ी एक तरह का व्यवहार करते हैं तो आप लोग हमें समझाते हैं. जब देश के दो छोटे ज़िलों पर कुछ बैनर लगते हैं जो कुल मिलाकर दो दर्जन भी नहीं होते हैं तो आप उसे पूरे वीएचपी के ऊपर ला रहे हैं. आप कह रहे हैं कि सारा वीएचपी ऐसा करता है. अगर हम ये करना चाहते तो दो घंटे के नोटिस पर सारे देश में कर सकते हैं. ये हुआ लेकिन हर जगह नहीं हो रहा, ये कहीं दोबारा नहीं किया जा जाएगा.

मैं ये मानता हूं कि मोहन भागवत जो कहते हैं वो हम सबके लिए कहते हैं और हमारी भी वही राय होती है जो उनकी होती है.

इन 8 हज़ार तब्लीग़ियों लोगों ने जो किया है उसके बावजूद हमारी कोई मंशा मुसलमान समुदाय के ख़िलाफ़ आक्रोश भड़काना नहीं है, बायकॉट करने की भावना नहीं है. सेवा प्राप्त करने का अधिकार सबको हैं. जैसा कि मोहन जी ने कहा है 130 करोड़ लोगों को समान अधिकार है. यही स्टैंड विश्व हिंदू परिषद का भी है.

क्या आपका ये संदेश आपके कार्यकर्ताओं तक नहीं पहुंच पा रहा है?

इस सवाल पर आलोक कुमार ने कहा- बजरंग दल, विश्व हिंदू परिषद ने बैनर लगाए और राज्य पुलिस ने ओवर-रिएक्ट किया. ये ऐसी ग़लतियां नहीं थीं कि इनके ख़िलाफ़ क्रिमिनल केस बना दिया जाए. इन लोकल घटनाओं को आप विहिप का एजेंडा कैसे बता दे रहे हैं. मैं दोहराना चाहता हूं कि जो मोहन भागवत जी ने कहा है वो हम सबके लिए और हम सबके हवाले से कहा है. हम अपने सभी लोगों को बता रहे हैं और हम सबको ये पता है कि मोहन जी जो कह रहे हैं वो हमारे लिए मार्गदर्शन होता है. कोरोना के इस वक़्त में हम किसी भी तरह धर्म के आधार पर बांटना नहीं चाहते. सभी भारतीय एक भारतीय होने के नाते इस लड़ाई से बाहर निकलें.

जो जमशेदपुर या नालंदा में हुआ है वो हमने एक पॉलिसी के लेवल पर तय नहीं किया है. हम मोहन जी के तय किए हुए स्टैंड पर कायम है. ऐसी घटनाएं दोहराई नहीं जाएंगी

हालांकि हमारे बार-बार पूछने के बावजूद वह इस तरह भगवा बैनर और झंडे लगा कर ‘हिंदू दुकान’ का सर्टिफिकेट देने की इस घटना की निंदा भी नहीं की.

अमरीका की एक संस्था ने भारत को उन 14 देशों की लिस्ट में रखा है जहां धार्मिक आज़ादी ख़तरे में है. कोविड -19 के समय भी हम इस्लामोफ़ोबिया के वीडियो लागातार सोशल मीडिया पर देख रहे हैं. ये हमारे लिए चिंता की बात नहीं है?

आलोक कुमार कहते हैं, आप तब्लिग़ी जमात के लोगों को निर्दोष मानती हैं. जिन इलाकों में डॉक्टर और नर्स लोगों का चेकअप करने गए वहां उनको पीटा गया ये वीडियो क्या हमने बनाए हैं, या सरकार ने तैयार किया. वो लोग जानबूझ कर अपने समुदाय के लिए मुश्किल पैदा कर रहे हैं. अपने ही इलाज को रोक रहे हैं. लोगों को अगर ये सब देख कर नाराज़गी हुई तो ये नाराज़गी अस्वभाविक नहीं थी.

इसके बावजूद हमारा स्टैंड वही है जो मोहन भागवत जी ने कहा है. रह गई बात अमरीका की रिपोर्ट की तो वह रिपोर्ट किस तरह के दबाव और लॉबिंग से तैयार की जाती है सबको पता है. मैं इस रिपोर्ट को ख़ारिज करता हूं.

ट्रंप की तारीफ़ मंज़ूर है लेकिन किसी संस्था की रिपोर्ट नहीं, क्या ये सलेक्टिव अप्रोच नहीं है?

इस सवाल के जवाब में आलोक कुमार कहते हैं, ”ये रिपोर्ट तथ्यात्मक रूप से ग़लत है. इस देश में अल्पसंख्यकों को बराबर के अधिकार हैं. और मैं मानता हूं ऐसा बना रहना चाहिए. ”

विश्व हिंदू परिषद के बारे में लोग क्या कहते हैं आप हमें उस चश्मे से मत देखिए. एक वाकया बताना चाहता हूं, ”संघ के एक सर संघचालक थे उनसे सवाल पूछा गया कि मुसलमान ये करते हैं तो हमें ये करना चाहिए. इसके जवाब में उन्होंने कहा था कि अगर इस देश में एक भी मुसलमान नहीं होता तो भी इस देश में हिंदुओं की वही हालात होती जो आज है. ”

वीएचपी पालघर लिंचिंग पर आक्रामक है तो बुलंदशहर में साधुओं की हत्या पर शांत क्यों है?

आलोक कुमार कहते हैं- मैं ये साफ़ करना चाहता हूं कि विश्व हिंदू परिषद ने कभी पालघर लिंचिंग मामले को हिंदू-मुसलमान नहीं बनाया. लेकिन पालघर मामले में हमारे कुछ सवाल हैं. अब तक मुख्य अभियुक्त की गिरफ्तारी नहीं की गई है. (बीबीसी ने जब इस ‘मुख्य अभियुक्त’ का नाम पूछा तो हमें कोई जवाब नहीं मिला.)

हमको बताया गया है कि अभियुक्तों की जमानत के लिए जो संस्थाएं काम कर रही है वो मिशनरी से जुड़ी हुई संस्थाएं हैं. हमने कहा है कि क्रिश्चियन लोग अभियुक्तों को सपोर्ट कर रहे हैं.

इसके साथ ही इस वीडियो में भीड़ द्वारा कई शब्द बोले जा रहा हैं जो मराठी नहीं बल्कि असम के सीमावर्ती इलाकों में बोले जाते हैं. सवाल ये है कि घटना में सिर्फ़ लोकल आदिवासी ही शामिल थे या कुछ दूसरे इलाके से भी लोग आए थे.

16 अप्रैल को घटना हुई लेकिन गिरफ्तारी 17 को नहीं हुई. जब वीडियो सामने आया तो सरकार ने गिरफ्तारी की. हमें लगता है कि महाराष्ट्र सरकार इसकी जांच ठीक तरीके से नहीं कर रही है और केंद्रीय जांच एजेंसी को ये केस अपने हाथों में लेना चाहिए.

बुलंदशहर की घटना पर हमारे उत्तर प्रदेश के मंत्री राजकवल गुप्ता ने पुजारियों की हत्या पर बयान जारी किया है. हमने पुलिस से जल्दी जांच करने को कहा है. मुख्य आरोपी भी पकड़ा जा चुका है. संभव है कि उसने अकेले ही इस हत्या को इंजाम दिया.

लिंचिंग को और एक शख़्स के हत्या करने को आप एक कैसे कर सकते हैं. दूसरी बात जैसे यूपी पुलिस ने कुछ घंटों के अंदर ही अभियुक्त को पकड़ा और महाराष्ट्र सरकार को तीन-चार दिन लग गए वो दिखाता है कि सवाल क्यों उठ रहे हैं.

ये एक स्तर की घटना ही नहीं है. बुलंदशहर में कोई और एंगल भी नहीं है और गिरफ्तारी तुरंत हुई है.

हमें अल्पसंख्यक विरोधी होने की ज़रूरत नहीं है और ना ही वो भारतीयता के अनुकूल होगा. हम समाज की सेवा करने में यकीन रखते हैं.

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