सेहत के लिए घातक है होली के रंग

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एक दौर ऐसा था जब लोग फूल-पत्तियों जैसे गुलाब, केवड़ा, पलाश, अमलतास, मेंहदी आदि सुगंधित पुष्पों से बनाया गया रंग ही डाला करते थे तथा हल्दी, चंदन, कत्था, दूध आदि का लेप लगाते थे। इसके पीछे वैज्ञानिक कारण भी था। विभिन्न प्रकार के प्राकृतिक रंगों के शरीर में पडऩे से अनेक रोगों का निदान हो जाता था, साथ ही शरीर कोमल, स्निग्ध व शीतल बना रहता था।

इस प्रकार के रंग त्वचा व स्वास्थ्य की दृष्टि से अत्यंत लाभदायक होते थे परंतु आज होली खेलने के लिए अनेक प्रकार के सिंथेटिक व रासायनिक रंगों, ग्रीस, ऑइल पेंट्स, कोलतार, डाईज, कीचड़, गोबर आदि का प्रयोग किया जाता है, जो असभ्यता और निकृष्ट मनोवृत्ति का परिचायक तो है ही, साथ ही साथ शरीर एवं स्वास्थ्य के लिए भी अत्यंत हानिकारक है।

जानिए इन रंगों से शरीर के विभिन्न अंगों पर पडऩे वाले दुष्प्रभावों के बारे में।

आंखों पर- आंख हमारे शरीर का सबसे संवदेनशील और नाजुक अंग है। यदि ये रंग आंखों में चले जाएं तो तात्कालिक अथवा स्थायी विकृति उत्पन्न करते हैं। आंखों में सूजन, दृष्टि में कमी, कॉर्निया का क्षतिग्रस्त होना, आंखों का लाल होकर पानी निकलना तथा ग्लूकोमा की आशंका बढ़ जाती है यहां तक कि इन रंगों से आंखों की रोशनी भी जा सकती है।

त्वचा पर- सिंथेटिक रंगों से सर्वाधिक हानि त्वचा को पहुंचती है। इन रंगों से त्वचा पर खुजली, जलन, सूजन, लालिमा, फोड़े-फुंसी, फफोले, त्वचा का फटना तथा बदरंग होना, एक्जिमा आदि लक्षण दिखाई पड़ते हैं जो एलर्जी के कारण उत्पन्न होते हैं। कुछ घातक रासायनिक तत्व धीरे-धीरे त्वचा के अंदर प्रवेश कर अन्य अंगों को भी नुकसान पहुंचाते हैं।

कानों में- यदि असावधानीवश ये रंग कानों में चले जाएं तो सुनने की क्षमता स्थायी या अस्थायी रूप से दुष्प्रभावित होती है।

बालों पर- रंगों के दुष्प्रभाव से बाल रूखे और दोमुंहे होकर झडऩे लगते हैं। बालों का असमय पकना व झडऩा तथा गंजापन आदि लक्षण भी प्रकट होते हैं।

पाचन तंत्रों में: मुंह के द्वारा घातक रसायन पेट में पहुंचकर अल्सर, छाले, गेस्ट्राइटिस पैदा करते हैं तथा अन्य उपाचयात्मक प्रक्रि याओं को नुकसान पहुंचाते हैं।

श्वसन तंत्र में- सांस के द्वारा नाक, गले व फेफड़ों में पहुंचकर ये रंग दमा, ब्रोंकाइटिस आदि का कारण बनते हैं। घातक रसायन श्वसन तंत्र पर बुरा असर डालते हैं। ये रंग फेफड़ों द्वारा रक्त में भी घुल सकते हैं।

अन्य दुष्प्रभाव- बाजार में उपलब्ध पेंट्स में लेड ऑक्साइड, कॉपर सल्फेट, एल्युमिनियम ब्रोमाइड और मरक्यूरी जैसे जहरीले पदार्थ मिले होते हैं जो अनेक प्रकार की एलर्जी को जन्म देते हैं। सिस्टेमिक विषों से युक्त गुलाल गुर्दे, लिवर व हड्डियों को नुकसान पहुंचाते हैं।

रंगों में मिलाए जाने वाले अलग-अलग धातुओं में सबसे ज्यादा खतरा लेड (सीसा) से होता है जो हमारे तंत्रिका तंत्र, गुर्दों और प्रजनन तंत्र पर बुरा असर डालते हैं। कुछ रंगों से डिसकलरेशन, डर्मेटाइटिस या स्किन एलर्जी भी हो सकती है।

कुछ लोग रंगों की जगह सिंदूर का प्रयोग करते हैं। इससे सफेद दाग जैसे त्वचा रोग भी हो सकता है क्योंकि सिंदूर में लेड ऑक्साइड और पैराफिनाइल डाइएमीन जैसे घातक रसायनों की मिलावट की जाती है।

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