पहला सुख निरोगी काया

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आज की भाग दौड़ भरी जिन्दगी में आदमी का सुख चैन खो गया है। व्यक्ति न तो समय पर खाना खा पाता है, न विश्राम कर पाता है। इसका परिणाम यह हो रहा है कि मनुष्य को अनेक सामाजिक एवं मानसिक समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। व्यक्ति शरीर एवं मन से बीमार होता जा रहा है।

मनुष्य तमाम भौतिक साधन क्यों जुटा रहा है, सुख शांति के लिए ही न, किन्तु क्या उसे सुख शांति मिल रही है? इस प्रश्न का उत्तर नकारात्मक ही है।

बड़े बुजुर्गो की यह उक्ति सार्थक है कि पहला सुख निरोगी काया। अगर हमारा शरीर स्वस्थ रहा तो हम प्रत्येक कार्य उल्लास एवं लगन के साथ करेंगे लेकिन अगर हम निरोगी न हुए तो हमारा मन किसी भी काम में नहीं लगेगा, अत: हमारी काया स्वस्थ रहे, यह अति आवश्यक है।

स्वस्थ रहने के लिए हमें अपनी दिनचर्या को व्यवस्थित रखना होगा। सुबह जल्दी उठना, व्यायाम करना, अल्पाहार लेना, दोपहर एवं रात को समय पर भोजन करना अति आवश्यक है। रात को जल्दी सोना एवं सुबह जल्दी उठना भी स्वस्थ रहने का मंत्र है।

बच्चे हमें स्वस्थ क्यों दिखाई देते हैं? क्योंकि वे खेलते रहते हैं, अत: खेल-कूद एवं व्यायाम हमारे लिए जरूरी हैं। खेलकूद एवं व्यायाम से हमारा तन ही नहीं, मन भी स्वस्थ रहता है। इसीलिए अक्सर यह कहा जाता है कि स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मन का निवास होता है।

अगर हमारा शरीर स्वस्थ रहेगा तो हमारा मन भी स्वस्थ रहेगा तथा हम दुगुने उल्लास से कार्य कर सकेंगे। अत: यह कथन उचित ही है कि मन चंगा तो कठौती में गंगा।

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