सलमान खान जैसी स्टार पावर से सजी मसाला फ़िल्म है दबंग 3

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साल 2009 में आई वॉटेंड ने सलमान खान के करियर को एक नया जीवन दिया था । लेकिन इसके एक साल बाद आई दबंग [2010] ने तो इस बात पर मुहर लगा दी थी कि वह लंबी रेस के घोड़े हैं और और उनका स्टारडम काफ़ी लंबे समय तक चलने वाला है । दर्शकों ने सलमान खान के चुलबुल पांडे किरदार को खूब पसंद किया । इसलिए जब दबंग 2 [2012] भी आई तो वो भी इतनी बड़ी ही हिट साबित हुई जितनी की दबंग थी, हालांकि कलेक्शन में थोड़ी कमी आई थी । और अब सात साल बाद सलमान और निर्माता-भाई अरबाज खान एक बार दबंग की तीसरी किश्त लेकर आए है, दबंग 3, जो क्रिसमस वीक पर रिलीज हुई है । लेकिन इस बार दबंग फ़्रैंचाइजी की तीसरी किश्त दबंग 3 को प्रभु देवा ने डायरेक्ट किया है । तो क्या ये फ़िल्म एक बार फ़िर मेकर्स के लिए फ़ायदे का सौदा साबित होगी या यह अपने प्रयास में विफ़ल हो जाएगी ? आइए समीक्षा करते है ।

दबंग 3, एक पुलिस वाले की कहानी है । चुलबुल पांडे (सलमान खान) अब टूंडला नामक एक कस्बे के एसपी हैं । जैसे ही वह आता है, वह एक बैंडमैन-गुंडे गुड्डू (नवाब शाह) को पकड़ लेता है और उसे सुधार देता है । वह फिर चिंटी वालिया (डॉली बिंद्रा) के अधीन एक मानव तस्करी रैकेट का भंडाफोड़ करता है । इस व्यवसाय का सरगना बाली सिंह (किच्चा सुदीपा) है । जैसे ही चुलबुल को इस पहलू के बारे में पता चलता है, वह सदमे में चला जाता है । कुछ दुखद यादें उसकी आंखों के सामने जीवंत हो उठती हैं । कहानी फिर फ्लैशबैक मोड में चली जाती है । यह एक ऐसा समय है जब चुलबुल का नाम धाकड़ था । उसके सामने ख़ुशी (सई मांजरेकर) की तस्वीर आ जाती है । सई को धाकड़ के भाई मक्खी (अरबाज खान) के लिए दुल्हन के रूप में चुना गया था । लेकिन धाकड़ को उससे प्यार हो जाता है । वह उससे मिलता है और अपने प्रगतिशील विचारों और निश्चित रूप से अपनी स्टाइल के साथ उसका दिल जीतता है । ख़ुशी के कहने पर, वह अपना नाम बदलकर चुलबुल रख लेता है । दोनों के बीच सब कुछ तय हो जाता है और सब कुछ ठीक चल रहा होता है । लेकिन दिन बाली सिंह अचानक सामने आ जाता है और उसे भी खुशी से प्यार हो जाता है । लेकिन जब उसे पता चलता है कि ख़ुशी, धाकड़ से प्यार करती है, तो वह क्रोधित हो जाता है और धाकड़ के सामने उसे मार देता है । वहीं ख़ुशी और उसके माता-पिता की हत्या के जुम्र में धाकड़ को जेल में डाल दिया जाता है । जेल में, वह एक बड़े दिल के पुलिस अधिकारी सत्येंद्र सिंह (शरत सक्सेना) से मिलता है । वह उसे बरी करने में मदद करता है और उसे पुलिस बल में शामिल होने के लिए प्रेरित करता है । जैसे ही वह चुलबुल पांडे के नाम से पुलिस का रुख करता है, सबसे पहले वह बाली सिंह को चट्टान के नीचे फ़ेंक देता है । बाली को मृत मान लिया जाता है । लेकिन बाली उसे चैलेंज देने के लिए फ़िर सामने आता है । इसके बाद आगे क्या होता है, ये आगे की फ़िल्म देखने के बाद ही पता चलता है ।

सलमान खान की कहानी बहुत कमजोर हैं और बुरी तरह से निराश करती है । उनके पास उपयोग करने के लिए कई अच्छे किरदार थे जिसका उन्होंने कम ही इस्तेमाल किया । सलमान खान, प्रभुदेवा, दिलीप शुक्ला और आलोक उपाध्याय की पटकथा प्रभावी है लेकिन कहीं कहीं । फ़िल्म फ़िर भी बांधती है लेकिन पुरानी कहानी के चलते स्क्रिप्ट मात खा जाती है । फ़िल्म में कुछ तारीफ़ के योग्य भी चीजें है । दर्शकों को इस बारे में बहुत कुछ सीखने को मिलता है कि चुलबुल और अन्य किरदार किस तरह से व्यवहार करते हैं । दिलीप शुक्ला और आलोक उपाध्याय के संवादों में अधिकांश जगहों पर एक पंच है । कुछ चुटकुले हालांकि काम नहीं करते हैं, खासकर शौचालय वाले जोक्स ।

प्रभुदेवा का निर्देशन औसत है और यहां फिर से कहानी दोषी बनती है । वह कुछ नया जोड़ने की कोशिश करते हैं लेकिन सभी सीन में सफ़ल नहीं हो पाते । इसके अलावा, फ़िल्म में बहुत सारे गाने हैं जो फिल्म की गति में रूकावट बनते हैं । और चौंकाने वाली बात यह है कि बाली सिंह के संबंध में एक महत्वपूर्ण रहस्य, अंत तक भी अनसुलझा ही रहता है । यह हैरानी की बात है कि निर्माताओं ने ऐसा क्यों चुना ।

दबंग 3 की शुरूआत, अच्छे नोट पर होती है । सलमान खान का एंट्री सीन कई मायनों में, सीटी और तालियों के योग्य है और यही फ़िल्म का सबसे अच्छा भाग है । चुलबुल जिस तरह से अगवा की गई लड़कियों को छुड़ाता है और चिंटी वालिया को सबक सिखाना, काफ़ी पसंद किया जाएगा । फ़्लैशबैक वाला हिस्सा भी अच्छी तरह से शुरू होता है और मज़ेदार भी है । लेकिन यहां पर बाली सिंह का ट्रेक काफ़ी घिसा-पिटा हुआ और पुराना लगता है । इंटरवल के बाद, फ़िल्म थोड़ी बेहतर हो जाती है क्योंकि चुलबुल पांडे चतुराई में बाली सिंह को हरा देता है । इसी के साथ फ़िल्म के कई हिस्सें अनुमानित हैं और समझ के परे है । क्लाइमेक्स फ़ाइट दर्शकों द्दारा खूब पसंद की जाएगी, खासकर सलमान खान के शर्टलेस सीक्वेंस को ।

दबंग 3 सिर्फ़ और सिर्फ़ सलमान खान की फ़िल्म है और वो ही इसे देखने लायक बनाते है । सलमान अपने किरदार को खूब एंजॉय करके निभाते हैं जो दिखाई देता है । उनका सेंस ऑफ़ ह्यूमर तो कमाल का है । इसके अलावा वह फ़्लैश-बैक हिस्सों में भी काफ़ी डेशिंग लगते है । सोनाक्षी सिन्हा अपना भरपूर समर्थन देती है । वह गानों में काफ़ी ऊर्जावाना दिखाई देती है । नवोदित अभिनेत्री सई मांजरेकर काफ़ी खूबसूरत लगती हैं और अपना बेहतरीन देने की कोशिश करती है । लेकिन उनकी डायलॉग डिलीवरी उतनी शानदार नहीं है । किच्चा सुदीप काफ़ी खतरनाक लगते है । लेकिन बेहतर प्रभाव के लिए उनका ट्रेक और भी खतरनाक होना चाहिए था । अरबाज खान, ठीक हैं और सेकेंड हाफ़ में उनका अहम हिस्सा है । डॉली बिंद्रा काफ़ी लाउड हैं लेकिन उन पर ये किरदार जंचता है । नवाब शाह कुछ खास नहीं लगते है । प्रमोद खन्ना अपने दिवंगत भाई विनोद खन्ना की खालि जगह को भरने की पूरी कोशिश करते हैं और सहजता से उनके किरदार में ढल जाते है । भरत दाभोलकर फ़िजूल हो जाते है । शरत सक्सेना ठी हैं । राजेश शर्मा (एस एस शर्मा) और परेश गनात्रा (डब्बू) मजाकिया होने की कोशिश करते हैं लेकिन वास्तव में सफल नहीं होते हैं ।

साजिद-वाजिद के संगीत में वो जान नहीं है । ‘हुड़ हुड़ दबंग’ सभी में बेहतर है और उसके बाद ‘मुन्ना बदनाम हुआ’ है । ‘नैना लडे’ प्यारा है । ‘यू करके’ और ‘हबीबी के नैन’ जबरदस्ती के जोड़े गए लगते है । ‘आवारा’ याद रखने योग्य नहीं है । संदीप शिरोडकर का बैकग्राउंड स्कोर शौर्यता से भरा है और प्राणपोषक है ।

महेश लिमये की सिनेमैटोग्राफी शानदार है और कुछ दृश्यों को अच्छी तरह से शूट किया गया है । अनल अरासु के एक्शन थोड़े खून-खराबे वाले हैं लेकिन काम करते है । वसीक खान का प्रोडक्शन डिजाइन आकर्षक है । एशले रेबेलो और अलविरा खान अग्निहोत्री की वेशभूषा भी आकर्षक है । रितेश सोनी का संपादन इतना स्मूद नहीं है खासकर एक्शन सीन में ।

कुल मिलाकर, दबंग 3 एक अनुमानित बदले की कहानी वाली फ़िल्म है जो सलमान खान की स्टार पावर का भरपूर लाभ उठाएगी । बॉक्सऑफ़िस की बात करें तो, इसमें सलमान खान के फ़ैंस के लिए पर्याप्त मसाला है जिसके चलते इसे क्रिसमस हॉलीडे में शानदार ओपनिंग मिलेगी लेकिन इसके बाद इसे मल्टीप्लेक्स स्क्रीन्स में संघर्ष करना पड़ सकता है ।

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