IAS संजीव हंस का पुराना विवाद: महिला अधिवक्ता के आरोप से हाईकोर्ट के फैसले तक, क्या था पूरा मामला?
पटना | Asian Times विशेष पड़ताल
बिहार के वरिष्ठ IAS अधिकारी संजीव हंस इन दिनों ठेकेदार ऋषु श्री से जुड़े कथित टेंडर घोटाले को लेकर चर्चा में हैं। लेकिन संजीव हंस का नाम पहली बार किसी विवाद में नहीं आया है। इससे पहले वर्ष 2023 में भी वह एक गंभीर मामले को लेकर सुर्खियों में रहे थे। उस समय एक महिला अधिवक्ता ने उन पर और पूर्व RJD विधायक गुलाब यादव पर गंभीर आरोप लगाए थे।
मामला इतना आगे बढ़ा कि पटना के रूपसपुर थाने में FIR दर्ज हुई और बाद में संजीव हंस को पटना हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा।
हालांकि, इस मामले में अगस्त 2024 में हाईकोर्ट ने संजीव हंस के खिलाफ दर्ज FIR और उससे जुड़ी कार्यवाही रद्द कर दी थी।
आखिर उस मामले में क्या हुआ था? महिला अधिवक्ता ने क्या आरोप लगाए थे? गुलाब यादव का नाम कैसे जुड़ा और हाईकोर्ट ने FIR रद्द करने का फैसला क्यों लिया? आइए पूरे घटनाक्रम को समझते हैं।
महिला अधिवक्ता ने क्या आरोप लगाए थे?
इस मामले की शिकायतकर्ता गायत्री कुमारी पेशे से अधिवक्ता थीं। पटना हाईकोर्ट में वर्ष 2009 से 2015 तक वकालत करने के बाद वह इलाहाबाद हाईकोर्ट में प्रैक्टिस कर रही थीं।
उनकी शिकायत के अनुसार, फरवरी 2016 में उनकी मुलाकात तत्कालीन विधायक गुलाब यादव से हुई थी। शिकायत में आरोप लगाया गया कि महिला आयोग में सदस्य बनाने का भरोसा देकर उन्हें गुलाब यादव से मिलवाया गया था।
महिला ने आरोप लगाया कि इसके बाद उनके साथ यौन उत्पीड़न की घटनाएं हुईं और उन्हें धमकियां भी दी गईं।
शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया था कि जुलाई 2017 में पुणे के एक होटल में उनकी मुलाकात संजीव हंस से कराई गई थी। महिला का दावा था कि वहां नशीला पदार्थ देकर उनके साथ यौन हिंसा की गई।
इसके बाद दिल्ली और अन्य स्थानों के होटलों में भी कथित घटनाओं का जिक्र शिकायत में किया गया था।
महिला ने आरोप लगाया था कि उन्हें वीडियो वायरल करने की धमकी दी गई और बाद में बच्चे के जन्म को लेकर भी विवाद हुआ।
ये सभी शिकायतकर्ता की ओर से लगाए गए आरोप थे। इन्हें अदालत द्वारा प्रमाणित तथ्य नहीं माना जा सकता।
2023 में दर्ज हुई FIR
महिला की शिकायत के बाद मामला न्यायिक प्रक्रिया में पहुंचा।
9 जनवरी 2023 को पटना के रूपसपुर थाने में केस संख्या 18/2023 के तहत FIR दर्ज की गई।
इस FIR में संजीव हंस, पूर्व विधायक गुलाब यादव और गुलाब यादव के कर्मचारी ललित का नाम शामिल था।
मामले में IPC की विभिन्न धाराओं के तहत आरोप दर्ज किए गए थे, जिनमें दुष्कर्म, सामूहिक दुष्कर्म, धोखाधड़ी, आपराधिक साजिश और धमकी से संबंधित धाराएं शामिल थीं।
FIR दर्ज होने के बाद मामला बिहार की प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गया।
संजीव हंस ने हाईकोर्ट में क्या दलील दी?
FIR दर्ज होने के बाद संजीव हंस ने पटना हाईकोर्ट में याचिका दायर की।
उन्होंने FIR और उससे जुड़ी न्यायिक कार्यवाही को रद्द करने की मांग की।
मामले की सुनवाई के दौरान उनके वकील की ओर से पुलिस की प्रारंभिक जांच रिपोर्ट, शिकायत में हुई देरी और उपलब्ध दस्तावेजों का हवाला दिया गया।
दूसरी ओर शिकायतकर्ता की तरफ से कहा गया कि उनके साथ यौन हिंसा हुई थी और मामले में DNA जांच की भी जरूरत थी।
यहां मामला केवल आरोप और जवाब तक सीमित नहीं रहा। अदालत ने पुलिस की प्रारंभिक जांच रिपोर्ट और अस्पताल से जुड़े दस्तावेजों सहित कई पहलुओं पर विचार किया।
6 अगस्त 2024: पटना हाईकोर्ट का बड़ा फैसला
इस मामले में 6 अगस्त 2024 को पटना हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति संदीप कुमार ने फैसला सुनाया।
अदालत ने संजीव हंस के खिलाफ दर्ज रूपसपुर थाना कांड संख्या 18/2023 की FIR और उससे संबंधित कार्यवाही को रद्द कर दिया।
फैसले में शिकायत दर्ज कराने में हुई देरी, पुलिस की प्रारंभिक जांच और उपलब्ध दस्तावेजों को महत्वपूर्ण आधार माना गया।
अदालत ने अपने फैसले में शिकायतकर्ता के आरोपों को संजीव हंस के संबंध में झूठा और मनगढ़ंत बताया।
यह इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण कानूनी घटनाक्रम था।
हालांकि, फैसले में राहत केवल संजीव हंस को मिली थी। इसे गुलाब यादव के खिलाफ पूरी कार्यवाही समाप्त होने के रूप में नहीं समझना चाहिए।
क्या इस मामले में ED की भी एंट्री हुई थी?
इस प्रकरण का एक और महत्वपूर्ण पहलू प्रवर्तन निदेशालय यानी ED की जांच है।
ED ने संजीव हंस के खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े मामले की जांच शुरू की थी।
16 दिसंबर 2024 की ED की आधिकारिक प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, एजेंसी ने संजीव हंस के सहयोगियों और उनके परिवार के सदस्यों से जुड़ी सात अचल संपत्तियों को अस्थायी रूप से अटैच किया था।
इन संपत्तियों का अनुमानित मूल्य लगभग 23.72 करोड़ रुपये बताया गया था।
ED की विज्ञप्ति के मुताबिक, एजेंसी की जांच रूपसपुर थाना कांड संख्या 18/2023 और बिहार SVU की FIR संख्या 5/2024 से जुड़े मामलों के आधार पर आगे बढ़ी थी।
यहां एक बात समझना जरूरी है कि ED की कार्रवाई मनी लॉन्ड्रिंग की जांच से संबंधित थी। इसे महिला अधिवक्ता के आरोपों की न्यायिक पुष्टि नहीं माना जा सकता।
अब ऋषु श्री टेंडर मामले से फिर चर्चा में संजीव हंस
महिला अधिवक्ता प्रकरण के बाद अब संजीव हंस का नाम ऋषु श्री से जुड़े कथित टेंडर और कमीशन मामले में सामने आया है।
इस मामले में विशेष निगरानी इकाई की जांच और आरोपपत्र को लेकर कई सवाल उठ रहे हैं।
जांच एजेंसियों के आरोपों के अनुसार, सरकारी टेंडर और कथित वित्तीय लेनदेन की जांच में संजीव हंस की भूमिका की पड़ताल की गई है।
दोनों मामलों की प्रकृति अलग है। महिला अधिवक्ता का मामला यौन उत्पीड़न के आरोपों से संबंधित था, जबकि ऋषु श्री प्रकरण सरकारी टेंडर और कथित भ्रष्टाचार से जुड़ा है।
फिलहाल उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर इन दोनों मामलों के बीच किसी सीधे आपराधिक संबंध का दावा नहीं किया जा सकता।
कुछ सवाल जिनके जवाब जनता जानना चाहती है
संजीव हंस से जुड़े अलग-अलग प्रकरणों के सामने आने के बाद कुछ महत्वपूर्ण सवाल उठते हैं।
- एक वरिष्ठ IAS अधिकारी के खिलाफ अलग-अलग मामलों में जांच किस तरह आगे बढ़ी?
- ED ने उनके सहयोगियों की संपत्तियों को किस आधार पर अटैच किया?
- ऋषु श्री टेंडर मामले में सामने आए कथित वित्तीय लेनदेन का पूरा विवरण क्या है?
- क्या टेंडर प्रक्रिया में दूसरे अधिकारियों की भूमिका की भी जांच हुई?
- जांच एजेंसियों के पास मौजूद दस्तावेजों में और किन लोगों के नाम सामने आए हैं?
इन सवालों के जवाब संबंधित जांच एजेंसियों, अदालतों और उपलब्ध आधिकारिक दस्तावेजों से सामने आने चाहिए।
Asian Times की पड़ताल जारी रहेगी
संजीव हंस से जुड़ा महिला अधिवक्ता प्रकरण इस कहानी का एक पुराना अध्याय है। वहीं ऋषु श्री से जुड़ा टेंडर मामला एक अलग जांच का विषय है।
Asian Times की इस विशेष सीरीज में हम दोनों मामलों के दस्तावेजों और घटनाक्रम को अलग-अलग रखकर पाठकों के सामने रखेंगे।
अगली कड़ी में हम ठेकेदार ऋषु श्री की कंपनियों, सरकारी टेंडरों और उन विभागों की पड़ताल करेंगे, जहां से उन्हें काम मिलने की बात सामने आई है।
यह सिर्फ एक अधिकारी या एक ठेकेदार की कहानी नहीं, बल्कि सरकारी व्यवस्था में जवाबदेही और पारदर्शिता से जुड़ा सवाल है।
Asian Times Investigation – सच, दस्तावेज और जवाबदेही।
Author: Noida Desk
मुख्य संपादक (Editor in Chief)







