कोटद्वार में एक जिम, एक नाम और खड़ी हुई लकीर: दीपक कुमार के समर्थन में उतरे सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील

कोटद्वार (उत्तराखंड)। एक वायरल वीडियो से शुरू हुआ विवाद अब सामाजिक समर्थन और कानूनी बिरादरी की एकजुटता की कहानी बन गया है। कोटद्वार के जिम संचालक दीपक कुमार, जिन्हें लोग “मोहम्मद दीपक” के नाम से भी जानते हैं, के व्यवसाय को साम्प्रदायिक तनाव के बाद बड़ा झटका लगा। लेकिन अब देश की सर्वोच्च अदालत से जुड़े वरिष्ठ वकीलों ने आगे बढ़कर उनके जिम को सहारा दिया है।

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क्या था पूरा मामला?

घटना 26 जनवरी की बताई जा रही है। आरोप है कि कुछ युवक एक 70 वर्षीय मुस्लिम दुकानदार—जो पार्किंसन बीमारी से पीड़ित हैं—पर अपनी दुकान के नाम से “बाबा” शब्द हटाने का दबाव बना रहे थे। इसी दौरान 38 वर्षीय दीपक कुमार वहां पहुंचे और कथित तौर पर बुजुर्ग के समर्थन में खड़े हो गए।

बहस के दौरान जब उनसे नाम पूछा गया तो उन्होंने जवाब दिया—“मोहम्मद दीपक।” यह वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गया। जहां कई लोगों ने इसे उत्पीड़न के खिलाफ साहसिक कदम बताया, वहीं कुछ समूहों ने नाराजगी भी जताई।

31 जनवरी को Bajrang Dal के कुछ कार्यकर्ता जिम के बाहर जमा हुए। पुलिस ने मौके पर पहुंचकर स्थिति को नियंत्रित किया और टकराव बढ़ने से रोक दिया।


जिम पर पड़ा सीधा असर

विवाद के बाद दीपक के “हलक जिम” में मेंबरशिप 150 से घटकर लगभग 15 रह गई। महीने का 40,000 रुपये किराया और गृह-ऋण की किश्तें—इन सबके बीच अचानक आय में आई गिरावट ने उन्हें आर्थिक संकट में डाल दिया।

दीपक का कहना है,

“आधा शहर मेरे साथ है, लेकिन सही काम करने पर लोग ताली नहीं बजाते। ईमानदारी की कीमत चुकानी पड़ती है।”

शहर में इस मुद्दे पर स्पष्ट बंटवारा दिखा—कुछ लोग खुलकर समर्थन में आए, तो कुछ ने दूरी बना ली।


सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकीलों का कदम

मामला जब राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आया, तो लगभग 15 वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने सामूहिक रूप से एक अनोखा निर्णय लिया। उन्होंने दीपक के जिम की एक-एक साल की सदस्यता लेने का फैसला किया और प्रत्येक ने 10,000 रुपये का योगदान दिया।

इस पहल को प्रेरणा मिली John Brittas से, जो पहले जिम का दौरा कर सदस्यता ले चुके थे और समर्थन जताया था।

एक वकील ने बताया कि दीपक ने सीधे आर्थिक सहायता लेने से इनकार कर दिया। उनकी स्वाभिमान की भावना को देखते हुए वकीलों ने नया रास्ता निकाला—वे जिम की सदस्यता खरीदकर कोटद्वार के ऐसे युवाओं को देंगे जो फीस देने में सक्षम नहीं हैं। इससे जिम भी चलेगा और जरूरतमंद युवाओं को फिटनेस का अवसर भी मिलेगा।


सामाजिक संदेश और व्यापक बहस

यह प्रकरण सिर्फ एक जिम या एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि सामाजिक सौहार्द और नागरिक साहस की परीक्षा भी बन गया है। एक ओर सोशल मीडिया की ताकत ने विवाद को बढ़ाया, वहीं दूसरी ओर उसी चर्चा ने देशभर से समर्थन भी जुटाया।

कानूनी बिरादरी का यह कदम संकेत देता है कि असहमति और तनाव के बीच भी संवैधानिक मूल्यों—समानता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और नागरिक साहस—के समर्थन में आवाज उठाई जा सकती है।

कोटद्वार की यह घटना बताती है कि छोटे शहरों की घटनाएं भी राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बन सकती हैं। दीपक कुमार के जिम की कहानी अब सिर्फ व्यापारिक नुकसान की नहीं, बल्कि सामाजिक एकजुटता और सम्मानजनक समर्थन की मिसाल बन चुकी है।

(रिपोर्ट: विशेष संवाददाता)

Noida Desk
Author: Noida Desk

मुख्य संपादक (Editor in Chief)

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