नई दिल्ली।
पूर्व थल सेना प्रमुख मनोज मुकुंद नरवणे की अप्रकाशित संस्मरण पुस्तक फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी को लेकर चल रहा राजनीतिक और कानूनी विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है। मंगलवार को इस पूरे प्रकरण पर अपनी चुप्पी तोड़ते हुए जनरल नरवणे ने प्रकाशक पेंग्विन रैंडम हाउस के आधिकारिक बयान का खुला समर्थन किया।
“यही है किताब का वर्तमान स्टेटस”
जनरल नरवणे ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पेंग्विन रैंडम हाउस के बयान का स्क्रीनशॉट साझा करते हुए संक्षेप में लिखा—
“यही किताब का वर्तमान स्टेटस है।”
उनका यह बयान उन तमाम अटकलों के बीच आया है, जो किताब के कथित अंशों के सोशल मीडिया पर वायरल होने और संसद तक पहुँचने के बाद तेज़ हो गई थीं।
संसद में हुआ था भारी हंगामा
यह विवाद 2 फरवरी को और गहरा गया, जब लोकसभा में ‘धन्यवाद प्रस्ताव’ पर चर्चा के दौरान विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने इस अप्रकाशित किताब के कुछ अंशों को उद्धृत करने की कोशिश की। सत्ता पक्ष के कड़े विरोध के चलते उन्हें ऐसा करने से रोक दिया गया। इसके बाद कांग्रेस और भाजपा के बीच इस किताब की सामग्री, उसकी प्रामाणिकता और प्रकाशन में हो रही देरी को लेकर तीखी जुबानी जंग शुरू हो गई।
दिल्ली पुलिस ने दर्ज की FIR
जनरल नरवणे की प्रतिक्रिया ऐसे समय पर आई है, जब दिल्ली पुलिस ने किताब के कथित अंशों के अवैध प्रसार को लेकर प्राथमिकी (FIR) दर्ज की है। पब्लिशर का कहना है कि पुस्तक अभी औपचारिक प्रकाशन प्रक्रिया में है और बिना अनुमति इसके अंशों का सार्वजनिक मंचों पर इस्तेमाल किया जाना नियमों का उल्लंघन है।
विपक्ष बनाम सरकार: आरोप-प्रत्यारोप
विपक्षी दलों का आरोप है कि केंद्र सरकार इस किताब के प्रकाशन को जानबूझकर रोक रही है, क्योंकि इसमें कुछ ऐसे तथ्य हो सकते हैं जो सरकार के लिए असहज साबित हों। खासतौर पर अग्निपथ योजना और लद्दाख सीमा संकट जैसे संवेदनशील मुद्दों को लेकर संभावित खुलासों की चर्चा ज़ोरों पर है।
वहीं, पब्लिशर और जनरल नरवणे की ओर से यह स्पष्ट किया गया है कि किताब न तो रोकी गई है और न ही रद्द—बल्कि वह सामान्य प्रकाशन प्रक्रिया से गुजर रही है।
क्या है ‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’?
यह पुस्तक जनरल नरवणे के सेना प्रमुख के रूप में कार्यकाल, सैन्य नेतृत्व के अनुभवों और महत्वपूर्ण रणनीतिक निर्णयों पर आधारित एक संस्मरण बताई जा रही है। किताब के आधिकारिक रूप से प्रकाशित होने से पहले ही इसके नाम पर राजनीतिक बवाल खड़ा हो जाना, इस पूरे मामले को और संवेदनशील बना रहा है।
जनरल नरवणे के ताज़ा बयान के बाद अब यह साफ हो गया है कि उन्होंने पब्लिशर के रुख का समर्थन किया है। फिलहाल गेंद प्रकाशक और कानूनी प्रक्रिया के पाले में है। जब तक किताब आधिकारिक रूप से प्रकाशित नहीं होती, तब तक इस विवाद के शांत होने की संभावना कम ही दिखाई देती है।
Author: Noida Desk
मुख्य संपादक (Editor in Chief)







