बिहार में लगातार बढ़ती राजनीतिक और सामाजिक उथल-पुथल: हमलों और षड्यंत्रों का दौर, आमजन में आक्रोश

पटना, बिहार:
बिहार की राजनीति इन दिनों उथल-पुथल के दौर से गुजर रही है। बदलते राजनीतिक समीकरण, विपक्ष और सत्तारूढ़ दलों के बीच तकरार, नेताओं पर बढ़ते हमले और कानून-व्यवस्था के हालात चिंता का विषय बन गए हैं। हाल ही में राज्य के विभिन्न जिलों में राजनेताओं पर किए गए हमलों, ग्रामीण क्षेत्रों में नेताओं के विरोध और बाहरी देशों से संदिग्ध तत्वों की घुसपैठ ने पूरे माहौल को तनावग्रस्त बना दिया है।

नेताओं पर लगातार हमले, साजिशों का आरोप
बीजेपी के वरिष्ठ नेता मंगल पांडेय पर हाल ही में हमला हुआ, जिसे भाजपा ने एक सुनियोजित साजिश बताया है। पार्टी के नेताओं का आरोप है कि विपक्षी दल लगातार डर और हिंसा का माहौल बनाने की कोशिश कर रहे हैं। मंगल पांडेय पर हमला कोई पहली घटना नहीं है, बल्कि पिछले कुछ महीनों में भाजपा नेताओं को निशाना बनाए जाने की घटनाएं लगातार बढ़ी हैं। हाल ही में जन सुराज प्रमुख प्रशांत किशोर पर भी हमला हुआ, जिससे राजनीतिक गलियारों में उफान आ गया।

गांवों में नेताओं का विरोध, नया ट्रेंड
राजनीति का गुस्सा अब सिर्फ शहरों और कस्बों तक सीमित नहीं रह गया है। ग्रामीण इलाकों में भी नेताओें का खुलकर विरोध जारी है। बीजेपी के एक अन्य वरिष्ठ नेता सरारवन कुमार को ग्रामीणों ने दौड़ा-दौड़ाकर भगा दिया — यह घटना सोशल मीडिया पर वायरल हो गई। इससे संकेत मिलता है कि जनता अब नेताओं की कथनी और करनी में अंतर से परेशान है और मन बना चुकी है कि वे सिर्फ वायदों पर यकीन नहीं करेंगे। घटना ने सरकार और विपक्ष दोनों के लिए स्थिति चिंताजनक बना दी है।

कानून-व्यवस्था को लेकर सवाल, बाहरी तत्वों की घुसपैठ
राज्य की कानून-व्यवस्था को लेकर सवाल लगातार उठ रहे हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, नेपाल के रास्ते पाकिस्तानी आतंकियों की घुसपैठ हुई है, जिससे कई जिलों में दहशत का माहौल है। खुफिया एजेंसियाँ अलर्ट पर हैं और सख्त पुलिसिंग की जा रही है, फिर भी आमजन के दिलों में डर बना हुआ है। सरकारी महकमे में अफसर और पुलिस अधिकारी चौकसी बढ़ा रहे हैं, लेकिन कुछ घटनाओं के सामने आने से इस खतरे की गंभीरता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

आमजन की प्रतिक्रिया और गुस्सा
घटनाओं की श्रृंखला और नेताओं के रवैये से आमजन में गहरा गुस्सा है। पानी फेंकने, जुलूसों को रोकने या नेताओं को भगाने जैसी घटनाएँ लोगों की नाराजगी और असहिष्णुता को उजागर करती हैं। जनता का रोष यह दर्शाता है कि वे अब लोकप्रिय नारों, धर्म और जाति की राजनीति से ऊपर उठकर असल मुद्दों — शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, सुरक्षा — पर नेताओं की जवाबदेही चाहती है।

राजनीतिक बयानबाजी और तनाव
नेताओं के बीच जुबानी जंग जोर पकड़ चुकी है। एक तरफ सत्तारूढ़ दल विपक्ष पर गुंडागर्दी और भय का माहौल बनाने का आरोप लगा रहे हैं, वहीं विपक्षी दल राज्य सरकार को कानून-व्यवस्था की नाकामी के लिए घेर रहे हैं। प्रशांत किशोर, मंगल पांडेय, सरारवन कुमार जैसे नेताओं पर हुए हमलों को लेकर सियासी बयानबाजी जोरों पर है। एक वर्ग इसे लोकतंत्र की हत्या कह रहा है, तो दूसरा इसे जनता की शक्ति और सचेत नागरिकता का प्रतीक मान रहा है।

आगे क्या?
बिहार जैसे राजनीतिक रूप से संवेदनशील राज्य में विरोध, तनाव और हमले कोई नई बात नहीं है, लेकिन हालिया घटनाओं ने माहौल में अलग ही तरह का उबाल ला दिया है। राजनीतिक दलों के लिए यह आत्मचिंतन का मौका है कि वे जनता की भावनाओं को किस तरह से समझें और कानून-व्यवस्था को बेहतर करने के लिए ठोस कदम उठाएँ।

फिलहाल, स्थिति नियंत्रण में नजर नहीं आ रही है। नेताओं के दौरे, पंचायतों में जनसंपर्क और सोशल मीडिया पर वायरल हो रही घटनाओं से जाहिर होता है कि बिहार एक निर्णायक दौर से गुजर रहा है। आने वाले चुनाव तक, यह गरमाहट और बढ़ सकती है। जनता जागरूक है और नेताओं से कार्यक्षमता, विकास, सुरक्षा की मांग कर रही है। अब यह देखना होगा कि कौन सा दल जनता की अपेक्षाओं पर खरा उतरता है और राज्य को किस दिशा में ले जाता है।

@tanvir Sheikh

Bihar Desk
Author: Bihar Desk

मुख्य संपादक (Editor in Chief)

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