पटना/पूर्णिया | Asian Times Bureau
बिहार में अपराध अब अंधेरे में नहीं होता।
अब वह दिनदहाड़े, भीड़ के बीच, कैमरे के सामने होता है — और अपराधी बेहिचक निकल जाते हैं।
पटना में प्रतिष्ठित उद्योगपति Gopal Khemka की हत्या और उसके बाद पूर्णिया में एक युवा कारोबारी को सरेआम गोलियों से भून दिया जाना, दो अलग-अलग घटनाएँ नहीं हैं। ये एक ही सच्चाई के दो चेहरे हैं —
बिहार में अपराधियों का मनोबल सरकार, पुलिस और कानून से आगे निकल चुका है।
खेमका हत्याकांड: राजधानी में कानून की साख पर हमला
पटना को हमेशा से बिहार की “सुरक्षित राजधानी” कहा जाता रहा है।
VIP मूवमेंट, पुलिस पेट्रोलिंग, CCTV नेटवर्क और प्रशासनिक मौजूदगी — सब कुछ।
इसके बावजूद, एक नामी उद्योगपति की हत्या होना यह बताने के लिए काफी है कि सुरक्षा का दावा कागज़ों तक सिमट गया है।
खेमका हत्याकांड ने यह सवाल खड़ा किया —
अगर राजधानी में इतना बड़ा कारोबारी सुरक्षित नहीं,
तो छोटे व्यापारी, दुकानदार, स्टार्टअप चलाने वाले युवा किस भरोसे कारोबार करें?
यह हत्या सिर्फ एक परिवार की त्रासदी नहीं थी,
यह बिहार की कानून-व्यवस्था की सार्वजनिक परीक्षा थी —
और इस परीक्षा में सिस्टम फेल नजर आया।
पूर्णिया: हत्या का लाइव प्रसारण
Purnia में हुई कारोबारी की हत्या ने अपराध के नए चेहरे को उजागर किया।
दिनदहाड़े, सड़क पर, लोगों की आवाजाही के बीच —
गोलियाँ चलीं, कारोबारी गिरा, और हमलावर भाग निकले।
सबसे खौफनाक तथ्य यह नहीं कि हत्या हुई,
सबसे डरावनी बात यह है कि
पूरी वारदात CCTV में कैद थी, फिर भी अपराधी निडर थे।
वीडियो में न घबराहट है, न जल्दबाज़ी।
यह साफ संकेत है कि अपराधियों को
न गिरफ्तारी का डर है,
न सजा का।
CCTV युग में अपराध: डर खत्म क्यों हुआ?
पहले कैमरा अपराधियों के लिए डर था।
आज कैमरा अपराध का गवाह बन गया है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि —
अपराधियों को भरोसा है कि
केस लंबा चलेगा
गवाह पलट जाएंगे
कानूनी प्रक्रिया में साल निकल जाएंगे
यही भरोसा अपराधियों के मनोबल को मजबूत कर रहा है।
सरकार के दावे बनाम ज़मीनी हकीकत
मुख्यमंत्री Nitish Kumar की सरकार बार-बार कहती है कि बिहार में “कानून का राज” है।
आंकड़े पेश किए जाते हैं, प्रेस कॉन्फ्रेंस होती हैं, और सख्ती के दावे दोहराए जाते हैं।
उपमुख्यमंत्री Samrat Choudhary का बयान और भी सख्त है:
“अपराधियों की सूची बन चुकी है।
या तो सुधर जाओ,
या बिहार छोड़ दो,
या आत्मसमर्पण कर दो।”
बयान में ताकत है।
लेकिन सवाल वही है जो जनता पूछ रही है —
अगर सूची बन चुकी है, तो अपराध खुलेआम क्यों हो रहे हैं?
अगर चेतावनी असरदार है, तो अपराधियों के चेहरे पर खौफ क्यों नहीं?
अपराधियों का मनोबल क्यों बढ़ा? — 5 बड़ी वजहें
सज़ा का डर खत्म
हत्या जैसे जघन्य अपराधों में भी
फैसले आने में सालों लग जाते हैं।
अपराधी जानते हैं — आज नहीं तो कल जमानत मिल जाएगी।
राजनीतिक संरक्षण की चर्चा
भले ही कोई नाम न ले,
लेकिन हर शहर में चर्चा है कि
कुछ अपराधी “ऊपर तक पहुँच” रखते हैं।
पुलिस सिस्टम की सीमाएँ
ईमानदार अफसर भी
तबादले, दबाव और संसाधनों की कमी से जूझ रहे हैं।
गवाहों का टूटना
डर, धमकी और समझौते
केस को कमजोर कर देते हैं।
सोशल मीडिया का उल्टा असर
CCTV वीडियो वायरल होते हैं,
लेकिन सजा न मिलने से
यह अपराधियों के लिए “डर” नहीं, “प्रचार” बन जाता है।
व्यापारी वर्ग: डर, गुस्सा और असुरक्षा
पटना से पूर्णिया तक
व्यापारी वर्ग में एक ही सवाल गूंज रहा है —
“आज वो मारा गया,
कल किसकी बारी?”
बंद, प्रदर्शन और ज्ञापन की बातें हो रही हैं।
लेकिन व्यापारी यह भी जानते हैं कि
👉 आवाज़ उठाने की कीमत भारी पड़ सकती है।
एक नज़र में
खेमका हत्याकांड — राजधानी में अपराध की हिम्मत
पूर्णिया कारोबारी हत्या — सरेआम कत्ल
CCTV मौजूद, खौफ नदारद
सरकार के दावे, जनता के सवाल
अब सरकार के सामने निर्णायक मोड़
खेमका हत्याकांड और पूर्णिया कारोबारी की हत्या
बिहार के लिए अंतिम चेतावनी हैं।
अब समय है —
फास्ट-ट्रैक कोर्ट
खुलेआम कार्रवाई
दोषियों को उदाहरणात्मक सजा
सिर्फ बयान नहीं,
दिखने वाली सख्ती चाहिए।
EDITORIAL CONCLUSION
अगर आज अपराधियों को रोका नहीं गया,
तो कल यह खबर फिर छपेगी —
बस नाम और शहर बदल जाएगा।
जब अपराधी निडर हो जाते हैं,
तो सबसे पहले कानून नहीं,
जनता का भरोसा मरता है।
Asian Times Bureau
Author: Noida Desk
मुख्य संपादक (Editor in Chief)






