₹2.50 लाख की लाइट ₹8 लाख में? सोशल मीडिया पोस्ट से उठी जांच की मांग, प्रशासन पर पारदर्शिता का दबाव
रिपोर्ट: एशियन टाइम्स ब्यूरो | पटना
फुलवारी शरीफ नगर परिषद एक बार फिर सुर्खियों में है। इस बार मामला विकास कार्यों से जुड़ा है, लेकिन आरोप गंभीर वित्तीय अनियमितता के हैं। सोशल मीडिया पर वायरल एक पोस्ट में दावा किया गया है कि नगर परिषद द्वारा खरीदी गई हाई मास्ट लाइट की कीमत बाजार दर से कई गुना अधिक दिखाई गई है। पोस्ट के अनुसार, जहां बाजार में एक हाई मास्ट लाइट की अनुमानित कीमत लगभग ₹2.50 लाख बताई जा रही है, वहीं नगर परिषद ने कथित रूप से उसे ₹8 लाख प्रति पीस की दर से खरीदा।
हालांकि इन आरोपों की अभी तक किसी सरकारी एजेंसी ने आधिकारिक पुष्टि नहीं की है, लेकिन मामले ने स्थानीय स्तर पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
क्या है पूरा विवाद?
सोशल मीडिया पर वायरल पोस्ट में आरोप लगाया गया है कि हाई मास्ट लाइट की खरीद में सरकारी धन का दुरुपयोग हुआ है। दावा किया गया है कि:
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वास्तविक बाजार मूल्य: लगभग ₹2,50,000 प्रति पीस
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खरीद मूल्य (कथित): ₹8,00,000 प्रति पीस
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प्रति यूनिट संभावित अंतर: लगभग ₹5,50,000
यदि यह अंतर वास्तविक है, तो यह बड़ा वित्तीय प्रश्न खड़ा करता है। लेकिन इस पूरे मामले में कई तकनीकी और प्रशासनिक पहलुओं को समझना जरूरी है।
क्या केवल “लाइट” की कीमत से तुलना उचित है?
विशेषज्ञों का कहना है कि हाई मास्ट लाइट केवल “एक बल्ब या पोल” नहीं होती। इसकी कुल लागत में कई तत्व शामिल होते हैं:
1. पोल की ऊंचाई
16 मीटर, 20 मीटर या 25 मीटर – ऊंचाई के अनुसार कीमत बदलती है।
2. LED लाइट की क्षमता
वाटेज, ब्रांड और ऊर्जा दक्षता के आधार पर लागत प्रभावित होती है।
3. फाउंडेशन और सिविल वर्क
गड्ढा खोदना, कंक्रीट बेस बनाना, एंकरिंग आदि का खर्च।
4. इलेक्ट्रिकल सिस्टम
कंट्रोल पैनल, केबलिंग, ऑटोमैटिक टाइमर या रिमोट सिस्टम।
5. इंस्टॉलेशन और श्रम लागत
6. वारंटी और AMC (Annual Maintenance Contract)
7. GST और अन्य टैक्स
संभव है कि ₹8 लाख की लागत में उपरोक्त सभी घटक शामिल हों, जबकि ₹2.50 लाख केवल “मटेरियल कॉस्ट” हो। इस अंतर को स्पष्ट किए बिना सीधी तुलना भ्रामक हो सकती है।
टेंडर प्रक्रिया पर भी उठे सवाल
स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि खरीद प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी और नियमों के तहत हुई है, तो:
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टेंडर नोटिस सार्वजनिक किया गया था या नहीं?
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कितनी कंपनियों ने भाग लिया?
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तकनीकी मूल्यांकन कैसे हुआ?
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सबसे कम बोली (L1) को ही ठेका दिया गया या नहीं?
यदि यह ओपन टेंडर था, तो पूरी प्रक्रिया सार्वजनिक होनी चाहिए।
प्रशासन की चुप्पी
अब तक नगर परिषद या संबंधित अधिकारियों की ओर से कोई विस्तृत आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। यही चुप्पी लोगों के संदेह को और बढ़ा रही है।
यदि आरोप निराधार हैं, तो प्रशासन को दस्तावेज सार्वजनिक कर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
यदि अनियमितता हुई है, तो यह जांच का विषय है।
नागरिकों की मांग
स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ताओं और जागरूक नागरिकों ने मांग की है कि:
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पूरी खरीद प्रक्रिया की स्वतंत्र जांच हो
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जिला प्रशासन या विजिलेंस विभाग मामले को देखे
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संबंधित फाइल और बिल सार्वजनिक किए जाएं
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RTI के माध्यम से दस्तावेज उपलब्ध कराए जाएं
राजनीतिक हलचल की संभावना
ऐसे मामलों में अक्सर विपक्षी दल सरकार और स्थानीय निकायों पर निशाना साधते हैं। यदि जांच की मांग तेज होती है, तो यह मामला राजनीतिक रंग भी ले सकता है।
नगर निकाय चुनाव और विकास कार्यों के बीच इस प्रकार के आरोप प्रशासन की छवि को प्रभावित कर सकते हैं।
कानूनी स्थिति क्या कहती है?
यदि सरकारी खरीद में वित्तीय अनियमितता पाई जाती है, तो:
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संबंधित अधिकारी पर विभागीय कार्रवाई
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आपराधिक मामला दर्ज
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विजिलेंस जांच
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ऑडिट आपत्ति
जैसी कार्यवाहियां संभव हैं। लेकिन यह सब आधिकारिक जांच के निष्कर्ष पर निर्भर करेगा।
एशियन टाइम्स
फिलहाल पूरा मामला सोशल मीडिया पर लगाए गए आरोपों पर आधारित है। तथ्यों की पुष्टि और आधिकारिक दस्तावेज सामने आए बिना किसी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी।
लेकिन इतना तय है कि सार्वजनिक धन से जुड़े हर प्रोजेक्ट में पारदर्शिता अनिवार्य है। प्रशासन को चाहिए कि वह संदेह दूर करने के लिए पूरी जानकारी सार्वजनिक करे।
जनता का पैसा जनता के हित में खर्च हो – यही लोकतंत्र की मूल भावना है।
Author: Noida Desk
मुख्य संपादक (Editor in Chief)







