यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम (POCSO Act) के कथित दुरुपयोग को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर चिंता जताई है। शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार से कानून में तथाकथित ‘रोमियो–जूलियट’ क्लॉज जोड़ने पर विचार करने को कहा है, ताकि किशोर उम्र में बने आपसी सहमति वाले प्रेम संबंधों को अपराध की श्रेणी में आने से रोका जा सके। अदालत का मानना है कि मौजूदा कानून कई मामलों में कठोर साबित हो रहा है, जहां 16–17 वर्ष की लड़की और 18–19 वर्ष के लड़के के बीच सहमति से संबंध होते हैं।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कहा कि 18 वर्ष से कम उम्र की लड़की की सहमति को कानून मान्यता नहीं देता, जिसके कारण ऐसे मामलों में भी लड़के पर बलात्कार या पॉक्सो का केस दर्ज हो जाता है। अदालत ने कहा कि यह प्रवृत्ति कानून के दुरुपयोग की ओर इशारा करती है, जिसे रोकने के लिए संतुलित सुधार जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि इस आदेश की प्रति विधि मंत्रालय के सचिव को भेजी जाए, ताकि संभावित संशोधनों पर विचार किया जा सके।
पीठ ने यह भी कहा कि बदले की भावना या दुर्भावनापूर्ण इरादे से पॉक्सो कानून का इस्तेमाल करने वालों के खिलाफ भी कार्रवाई की व्यवस्था होनी चाहिए। यह मामला उत्तर प्रदेश सरकार की उस याचिका से जुड़ा था, जिसमें इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा दिए गए जमानत आदेश को चुनौती दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी को दी गई जमानत बरकरार रखी, लेकिन यह स्पष्ट किया कि बेल के स्तर पर हाई कोर्ट ‘मिनी ट्रायल’ नहीं कर सकता और पीड़ित की उम्र तय करना ट्रायल कोर्ट का विषय है, न कि बेल कोर्ट का। विशेषज्ञों के अनुसार यह फैसला बच्चों की सुरक्षा और किशोर प्रेम संबंधों के बीच संतुलन बनाने की दिशा में अहम माना जा रहा है।
@MUSKAN KUMARI






