प्रस्तावना
बिहार सरकार ने भूमि और संपत्ति से जुड़े दस्तावेज़ों की पारदर्शिता और सुलभता की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम उठाया है। अब राज्य में वर्ष 1908 से लेकर वर्तमान समय तक के रजिस्ट्री (पंजीयन) दस्तावेज़ ऑनलाइन उपलब्ध कराए जा रहे हैं। इस फैसले से न केवल आम नागरिकों को बड़ी राहत मिलेगी, बल्कि भूमि विवाद, धोखाधड़ी और भ्रष्टाचार जैसी समस्याओं पर भी प्रभावी अंकुश लगेगा। लंबे समय से लोग पुराने रजिस्ट्री पेपर निकालने के लिए निबंधन कार्यालयों के चक्कर काटने को मजबूर थे। अब यह पूरी प्रक्रिया डिजिटल प्लेटफॉर्म पर लाई जा रही है।
यह रिपोर्ट इसी योजना की पृष्ठभूमि, उद्देश्य, प्रक्रिया, लाभ, चुनौतियों और भविष्य के प्रभावों पर विस्तृत प्रकाश डालती है।
योजना की पृष्ठभूमि
बिहार जैसे बड़े और घनी आबादी वाले राज्य में भूमि विवाद एक गंभीर समस्या रही है। जमीन की खरीद-बिक्री, विरासत, बंटवारा और मुकदमों में रजिस्ट्री दस्तावेज़ सबसे अहम प्रमाण माने जाते हैं। लेकिन 1908 से लेकर 1990 या उससे पहले के दस्तावेज़ कागज़ी रूप में सुरक्षित थे, जिनकी हालत कई जगहों पर जर्जर हो चुकी थी।
निबंधन कार्यालयों में वर्षों पुराने दस्तावेज़ों की खोज एक कठिन और समय लेने वाली प्रक्रिया थी। कई बार फाइलें गुम हो जाती थीं या जानबूझकर दबा दी जाती थीं। इससे न केवल आम नागरिकों को परेशानी होती थी, बल्कि भ्रष्टाचार को भी बढ़ावा मिलता था।
इन्हीं समस्याओं को देखते हुए बिहार सरकार के राजस्व एवं निबंधन विभाग ने पुराने रजिस्ट्री दस्तावेज़ों के डिजिटलीकरण का फैसला लिया।
क्या है नई व्यवस्था
नई व्यवस्था के तहत बिहार के सभी निबंधन कार्यालयों में उपलब्ध पुराने रजिस्ट्री दस्तावेज़ों को चरणबद्ध तरीके से स्कैन कर ऑनलाइन पोर्टल पर अपलोड किया जा रहा है। इस योजना में:
- वर्ष 1908 से अब तक के रजिस्ट्री दस्तावेज़ शामिल हैं।
- कुल 141 निबंधन कार्यालयों के रिकॉर्ड को डिजिटल किया जा रहा है।
- अनुमानतः 6 करोड़ से अधिक दस्तावेज़ इस परियोजना के अंतर्गत आते हैं।
- 1990 से अब तक के अधिकतर दस्तावेज़ पहले ही ऑनलाइन उपलब्ध कराए जा चुके हैं।
- 1908 से 1990 तक के दस्तावेज़ों की स्कैनिंग और अपलोडिंग का कार्य तेजी से चल रहा है।
सरकार का लक्ष्य है कि अगले कुछ महीनों में यह प्रक्रिया पूरी कर ली जाए।
ऑनलाइन रजिस्ट्री पेपर कैसे मिलेंगे
अब नागरिकों को पुराने रजिस्ट्री दस्तावेज़ प्राप्त करने के लिए कार्यालयों के चक्कर नहीं काटने होंगे। पूरी प्रक्रिया ऑनलाइन होगी:
- आवेदक को राजस्व एवं निबंधन विभाग की आधिकारिक वेबसाइट पर जाना होगा।
- वेबसाइट पर नाम, ई-मेल आईडी और मोबाइल नंबर के माध्यम से लॉगिन करना होगा।
- इसके बाद संबंधित जिले, निबंधन कार्यालय, वर्ष और दस्तावेज़ का विवरण भरना होगा।
- जमीन से संबंधित खाता नंबर, खेसरा नंबर, प्लॉट नंबर जैसी जानकारी दर्ज करनी होगी।
- आवेदन जमा करने के बाद 600 रुपये का शुल्क ऑनलाइन भुगतान करना होगा।
- शुल्क जमा होते ही रजिस्ट्री दस्तावेज़ को पीडीएफ फॉर्मेट में डाउनलोड किया जा सकेगा।
डाउनलोड किया गया दस्तावेज़ सरकारी और निजी दोनों तरह के कार्यों में मान्य होगा।
शुल्क व्यवस्था
सरकार ने इस सेवा के लिए 600 रुपये का शुल्क निर्धारित किया है। यह शुल्क एक दस्तावेज़ के लिए लिया जाएगा। पहले जहां लोगों को दलालों और कर्मचारियों को हजारों रुपये देने पड़ते थे, वहीं अब एक तय और पारदर्शी शुल्क में काम पूरा हो सकेगा।
क्या होगा फायदा
इस योजना से आम जनता को कई बड़े फायदे होंगे:
1. समय की बचत
पहले पुराने रजिस्ट्री पेपर निकालने में महीनों लग जाते थे। अब कुछ ही मिनटों में दस्तावेज़ डाउनलोड किया जा सकेगा।
2. भ्रष्टाचार पर रोक
ऑनलाइन व्यवस्था से निबंधन कार्यालयों में दलालों और रिश्वतखोरी पर अंकुश लगेगा।
3. भूमि विवादों में कमी
स्पष्ट और आसानी से उपलब्ध दस्तावेज़ों से जमीन विवादों में कमी आएगी और न्यायिक प्रक्रिया को मजबूती मिलेगी।
4. पारदर्शिता
डिजिटल रिकॉर्ड से किसी भी तरह की छेड़छाड़ की संभावना कम होगी।
5. सुरक्षित दस्तावेज़
पुराने कागज़ी रिकॉर्ड खराब होने, जलने या गुम होने का खतरा समाप्त होगा।
किसानों और आम नागरिकों के लिए राहत
ग्रामीण इलाकों में किसानों को अपनी जमीन के कागज़ात के लिए अक्सर दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ते थे। कई बार पीढ़ियों पुराने दस्तावेज़ ढूंढना लगभग असंभव हो जाता था। इस नई व्यवस्था से किसानों, बुजुर्गों और दूर-दराज के इलाकों में रहने वाले लोगों को बड़ी राहत मिलेगी।
भूमि माफियाओं पर लगेगी लगाम
बिहार में जमीन से जुड़े फर्जीवाड़े और अवैध कब्जे की शिकायतें आम रही हैं। पुराने रजिस्ट्री दस्तावेज़ों की अनुपलब्धता का फायदा उठाकर भूमि माफिया फर्जी दावे करते थे। अब जब सभी दस्तावेज़ ऑनलाइन होंगे, तो किसी भी जमीन का इतिहास आसानी से जांचा जा सकेगा।
प्रशासनिक दृष्टिकोण
राजस्व एवं निबंधन विभाग के अधिकारियों के अनुसार यह परियोजना राज्य और केंद्र सरकार के सहयोग से चलाई जा रही है। इसके लिए विशेष एजेंसियों को नियुक्त किया गया है जो दस्तावेज़ों की स्कैनिंग और डिजिटलीकरण का काम कर रही हैं।
अधिकारियों का कहना है कि गुणवत्ता बनाए रखने के लिए हर दस्तावेज़ की जांच की जा रही है ताकि स्कैन की गई कॉपी स्पष्ट और पढ़ने योग्य हो।
तकनीकी चुनौतियां
हालांकि यह परियोजना बेहद महत्वपूर्ण है, लेकिन इसके सामने कुछ चुनौतियां भी हैं:
- कई दस्तावेज़ अत्यंत पुराने और जर्जर स्थिति में हैं।
- कुछ रिकॉर्ड अधूरे या क्षतिग्रस्त हैं।
- स्कैनिंग के दौरान डेटा की शुद्धता बनाए रखना एक बड़ी चुनौती है।
इसके बावजूद सरकार का दावा है कि आधुनिक तकनीक और विशेषज्ञों की मदद से इन समस्याओं का समाधान किया जा रहा है।
भविष्य की योजनाएं
सरकार की योजना है कि आने वाले समय में:
- सभी भूमि रिकॉर्ड को एक ही प्लेटफॉर्म पर जोड़ा जाए।
- रजिस्ट्री, दाखिल-खारिज और नक्शा जैसी सेवाओं को आपस में लिंक किया जाए।
- आम नागरिकों को मोबाइल ऐप के जरिए भी दस्तावेज़ उपलब्ध कराए जाएं।
सामाजिक और कानूनी प्रभाव
इस डिजिटल पहल का असर सिर्फ प्रशासनिक नहीं, बल्कि सामाजिक और कानूनी स्तर पर भी पड़ेगा। कोर्ट में चल रहे भूमि विवादों में दस्तावेज़ आसानी से पेश किए जा सकेंगे। इससे मामलों के निपटारे में तेजी आएगी।
1908 से अब तक के रजिस्ट्री दस्तावेज़ों को ऑनलाइन करना बिहार सरकार का एक दूरदर्शी और ऐतिहासिक कदम है। यह न केवल आम जनता की समस्याओं को कम करेगा, बल्कि भूमि व्यवस्था में पारदर्शिता और भरोसा भी बढ़ाएगा।
डिजिटल इंडिया की दिशा में यह पहल बिहार के लिए एक मिसाल बन सकती है। अगर यह योजना पूरी तरह सफल होती है, तो आने वाले वर्षों में जमीन से जुड़े विवादों और भ्रष्टाचार में बड़ी कमी देखने को मिलेगी।
(यह रिपोर्ट जनहित में उपलब्ध सरकारी जानकारी और विभागीय सूचनाओं पर आधारित है।)
Author: Noida Desk
मुख्य संपादक (Editor in Chief)







