बिहार की राजनीति में एक बड़े युग का अंत होने जा रहा है। महज 105 दिन पहले दसवीं बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने वाले Nitish Kumar ने राज्यसभा जाने का फैसला किया है। खुद सोशल मीडिया पर इसकी जानकारी देते हुए उन्होंने संकेत दिया कि अब राज्य की सत्ता में बड़ा बदलाव होने वाला है। इस फैसले के साथ ही लगभग दो दशकों से बिहार की राजनीति के केंद्र में रहे नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री कार्यकाल का समापन तय माना जा रहा है।
नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने के फैसले के बाद राज्य में नई सरकार बनने की प्रक्रिया तेज होने की संभावना है। पिछले विधानसभा चुनाव में Bharatiya Janata Party 89 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी, जबकि Janata Dal (United) को 85 सीटें मिली थीं। चुनाव पूर्व हुए समझौते के तहत मुख्यमंत्री पद नीतीश कुमार को मिला था, लेकिन अब उनके हटने के साथ ही यह संभावना मजबूत हो गई है कि पहली बार बिहार में भाजपा का मुख्यमंत्री बन सकता है।
हिंदी हार्टलैंड का आखिरी किला
1980 में गठन के बाद से भाजपा लगातार अपने विस्तार की ओर बढ़ती रही है। दो लोकसभा सीटों से शुरू हुई यात्रा आज 300 से अधिक सीटों तक पहुंच चुकी है। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हरियाणा, उत्तराखंड, छत्तीसगढ़, राजस्थान और हिमाचल प्रदेश जैसे हिंदी भाषी राज्यों में पार्टी कई बार सत्ता में आ चुकी है। लेकिन बिहार ऐसा राज्य रहा है जहां अब तक भाजपा अपना मुख्यमंत्री नहीं बना सकी है। ऐसे में अगर इस बार भाजपा का मुख्यमंत्री बनता है तो यह पार्टी के लिए हिंदी हार्टलैंड का आखिरी किला फतह करने जैसा होगा।
नौवीं बार कार्यकाल पूरा नहीं कर पाएंगे नीतीश
बिहार की राजनीति में Nitish Kumar का नाम पिछले दो दशकों से सत्ता का पर्याय रहा है। 2000 में पहली बार मुख्यमंत्री बनने वाले नीतीश का पहला कार्यकाल महज सात दिन चला था। इसके बाद 2005 से उन्होंने लंबे समय तक राज्य की सत्ता संभाली। हालांकि राजनीतिक परिस्थितियों और गठबंधन बदलने की वजह से वे कई बार अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए। अब दसवीं बार शपथ लेने के महज 105 दिन बाद उनका मुख्यमंत्री पद छोड़ना तय माना जा रहा है, जिससे वे नौवीं बार भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाएंगे।
पीढ़ीगत बदलाव का दौर
आपातकाल के दौर में उभरी नेताओं की पीढ़ी ने दशकों तक बिहार की राजनीति को दिशा दी। इस पीढ़ी में Lalu Prasad Yadav, Ram Vilas Paswan, Sushil Kumar Modi, Sharad Yadav और Nitish Kumar जैसे बड़े नाम शामिल रहे। इनमें से रामविलास पासवान, सुशील मोदी और शरद यादव का निधन हो चुका है, जबकि लालू प्रसाद यादव सक्रिय चुनावी राजनीति से दूर हैं। ऐसे में नीतीश कुमार का दिल्ली जाना बिहार की राजनीति में पीढ़ीगत बदलाव का संकेत माना जा रहा है।
जदयू पहली बार बैक सीट पर
पिछले करीब बीस वर्षों से बिहार की सत्ता का नेतृत्व Janata Dal (United) के हाथ में रहा है। यदि इस बार भाजपा का मुख्यमंत्री बनता है तो जदयू पहली बार राज्य की सत्ता में सहयोगी दल की भूमिका में नजर आएगी। यह स्थिति पार्टी के गठन के बाद पहली बार देखने को मिल सकती है।
दूसरी बार बिना शीर्ष नेता के सत्ता में जदयू
यह दूसरा अवसर होगा जब जदयू सत्ता में हिस्सेदार तो रहेगी, लेकिन उसका शीर्ष नेता मुख्यमंत्री पद पर नहीं होगा। इससे पहले 2014 में लोकसभा चुनाव में हार के बाद नीतीश कुमार ने इस्तीफा दिया था और Jitan Ram Manjhi को मुख्यमंत्री बनाया गया था। हालांकि नौ महीने बाद नीतीश ने फिर से सत्ता की कमान संभाल ली थी।
नीतीश कुमार के इस फैसले के साथ ही बिहार की राजनीति एक नए दौर में प्रवेश करती दिख रही है, जहां नई पीढ़ी के नेताओं के उभरने की संभावना भी तेज हो गई है।
@MUSKAN KUMARI







