Patna की राजनीति एक बार फिर अटकलों और संकेतों के दौर में प्रवेश करती दिखाई दे रही है। बिहार के मुख्यमंत्री Nitish Kumar का राज्यसभा चुनाव के दौरान मतदान प्रक्रिया से दूर रहना राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बन गया है।
विधानसभा में राज्यसभा चुनाव के लिए मतदान के दौरान जहां प्रमुख राजनीतिक दलों के नेता मौजूद थे, वहीं नीतीश कुमार इस प्रक्रिया में शामिल नहीं हुए। बताया गया कि वह उस समय प्रशासनिक कार्यों और निरीक्षण में व्यस्त थे। हालांकि उनकी यह अनुपस्थिति सामान्य राजनीतिक परंपरा से अलग मानी जा रही है, जिसके कारण कई तरह के कयास लगाए जा रहे हैं।
चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद भी मुख्यमंत्री की ओर से कोई औपचारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई। न तो उन्होंने सार्वजनिक रूप से जीत पर कोई टिप्पणी की और न ही किसी प्रकार का बधाई संदेश जारी किया। राजनीतिक विश्लेषक इसे एक तरह की ‘संकेत राजनीति’ के रूप में देख रहे हैं, जिसमें मौन भी एक संदेश माना जाता है।
अगर उनके राजनीतिक इतिहास पर नजर डाली जाए तो यह स्पष्ट होता है कि नीतीश कुमार कई बार परिस्थितियों के अनुसार अपने राजनीतिक फैसले बदलते रहे हैं। Bharatiya Janata Party से अलग होना और फिर दोबारा गठबंधन करना, साथ ही Lalu Prasad Yadav की पार्टी Rashtriya Janata Dal के साथ राजनीतिक विरोध के बावजूद गठबंधन करना, उनकी बदलती रणनीतियों के उदाहरण रहे हैं।
वर्ष 2013, 2017 और 2022 में हुए राजनीतिक घटनाक्रम भी बताते हैं कि वह समय और परिस्थिति के अनुसार नई रणनीति अपनाने में सक्षम रहे हैं। यही वजह है कि राजनीतिक विश्लेषक उन्हें एक परिवर्तनशील रणनीतिकार के रूप में देखते हैं।
फिलहाल मुख्यमंत्री का ध्यान अपनी ‘समृद्धि यात्रा’ और प्रशासनिक गतिविधियों पर केंद्रित बताया जा रहा है। वहीं उनके बेटे Nishant Kumar की बढ़ती सार्वजनिक सक्रियता को लेकर भी राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं तेज हैं।
ऐसे में सवाल यह उठ रहा है कि राज्यसभा चुनाव से उनकी दूरी केवल प्रशासनिक व्यस्तता थी या इसके पीछे कोई बड़ी राजनीतिक रणनीति छिपी है। फिलहाल बिहार की राजनीति में इस घटनाक्रम को लेकर सस्पेंस बना हुआ है और आने वाले दिनों में स्थिति स्पष्ट होने की उम्मीद की जा रही है।
@MUSKAN KUMARI






