बिहार की राजनीति में पशुपति पारस की भूमिका: क्या आगामी चुनाव तय करेंगे असली नेता?
@Tanvir Sheikh
भूमिका
बिहार की राजनीति में पासवान परिवार का दशकों से मजबूत प्रभाव रहा है। दिवंगत रामविलास पासवान ने सामाजिक न्याय और दलित राजनीति का जो आधार तैयार किया था, वह आज भी कायम है। उनके निधन के बाद, यह सवाल लगातार उठता रहा है कि उनके वास्तविक उत्तराधिकारी कौन होंगे—उनके छोटे भाई पशुपति कुमार पारस या उनके बेटे चिराग पासवान?
2024 के लोकसभा चुनाव और 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव इस सवाल का जवाब देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। इन चुनावों से यह तय होगा कि बिहार की राजनीति में पासवान वोट बैंक किस दिशा में जाएगा और पासवान समुदाय के असली नेता कौन होंगे।
पासवान परिवार का राजनीतिक सफर
रामविलास पासवान: सामाजिक न्याय के योद्धा
रामविलास पासवान बिहार की राजनीति में एक मजबूत दलित नेता के रूप में उभरे थे। उन्होंने 2000 में लोक जनशक्ति पार्टी (LJP) की स्थापना की और अपनी पूरी राजनीतिक यात्रा में दलितों और पिछड़ों की आवाज़ को बुलंद किया।
उनका राजनीतिक सफर बेहद दिलचस्प रहा:
1977: पहली बार लोकसभा चुनाव जीता।
1989-2004: लगातार छह बार सांसद बने और विभिन्न सरकारों में केंद्रीय मंत्री रहे।
2000: LJP की स्थापना की और बिहार की राजनीति में तीसरी ताकत के रूप में उभरे।
2014 और 2019: NDA के सहयोगी के रूप में जबरदस्त प्रदर्शन किया।
2020: बिहार विधानसभा चुनावों में LJP ने अकेले लड़ने का फैसला किया, लेकिन खराब प्रदर्शन के कारण पार्टी में अंदरूनी कलह बढ़ गई।
चाचा बनाम भतीजा: सत्ता संघर्ष की शुरुआत
रामविलास पासवान के निधन के बाद, उनके राजनीतिक उत्तराधिकारी को लेकर पार्टी में संघर्ष शुरू हो गया। पशुपति पारस और चिराग पासवान के बीच मतभेद गहराते चले गए।
LJP का विभाजन
2021 में, पशुपति पारस ने LJP पर कब्जा कर लिया और खुद को असली उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। उन्होंने पार्टी के 5 में से 4 सांसदों को अपने साथ कर लिया, जिससे चिराग पासवान पूरी तरह अलग-थलग पड़ गए। इसके बाद LJP दो गुटों में बंट गई—
राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी (RLJP) – पशुपति पारस की अगुवाई में
लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) (LJP-R) – चिराग पासवान की अगुवाई में
NDA में पशुपति पारस की स्थिति
पशुपति पारस ने केंद्र में मंत्री पद संभाला, जिससे NDA में उनकी स्थिति मजबूत हुई। हालांकि, भाजपा अभी भी यह तय करने में उलझी हुई है कि आगामी चुनावों में पासवान परिवार में से किसे ज्यादा महत्व दिया जाए।
चिराग पासवान: मोदी के ‘हनुमान’ की रणनीति
चिराग पासवान खुद को रामविलास पासवान का असली उत्तराधिकारी बताते हैं। 2020 में उन्होंने खुद को ‘मोदी का हनुमान’ बताते हुए NDA से अलग होकर चुनाव लड़ा, लेकिन नतीजे उनके पक्ष में नहीं रहे। अब वे फिर से NDA के साथ आने के प्रयास में हैं।
अगर चिराग को NDA में सम्मानजनक सीटें मिलती हैं, तो वे अपने पिता की विरासत को मजबूती से आगे बढ़ा सकते हैं। लेकिन यदि भाजपा उन्हें नजरअंदाज करती है, तो राजद (RJD) और कांग्रेस उन्हें अपने साथ जोड़ने का प्रयास कर सकते हैं।
बिहार चुनाव में पासवान वोटों का महत्व
बिहार में दलित वोट बैंक की बड़ी संख्या है, जिसमें पासवान समुदाय का खासा प्रभाव है।
पासवान समुदाय की जनसंख्या: बिहार में दलित आबादी लगभग 16% है, जिसमें पासवान समुदाय की हिस्सेदारी 4-5% के आसपास मानी जाती है।
NDA के लिए वोट बैंक: 2014 और 2019 में पासवान समुदाय ने NDA को बड़े पैमाने पर समर्थन दिया था।
राजनीतिक प्रभाव: पासवान समुदाय के वोट कई सीटों पर जीत-हार तय कर सकते हैं, खासकर दलित और अति पिछड़ा वर्ग (EBC) के समीकरणों में।
क्या चाचा या भतीजा होगा असली नेता?
आगामी चुनाव तय करेगा कि पासवान वोट किसके पक्ष में जाएगा।अगर चिराग पासवान NDA में आते हैं: यह देखना होगा कि भाजपा उन्हें कितनी सीटें देती है और क्या वे अपने चाचा से ज्यादा प्रभावशाली साबित हो सकते हैं।
अगर चिराग महागठबंधन में जाते हैं: तो राजद (RJD) और कांग्रेस उन्हें दलित नेता के रूप में पेश करने की कोशिश कर सकते हैं।अगर NDA पशुपति पारस को प्राथमिकता देता है: तो चिराग के पास अकेले चुनाव लड़ने के अलावा कोई और रास्ता नहीं बचेगा, जिससे उनकी राजनीति कमजोर हो सकती है।पशुपति पारस की राजनीतिक रणनीति
पशुपति पारस जानते हैं कि अकेले चुनाव जीतना उनके लिए संभव नहीं है। इसलिए वे भाजपा के साथ बने रहना चाहते हैं। लेकिन भाजपा के लिए पशुपति पारस और चिराग दोनों को साथ रखना एक चुनौती होगी।
पशुपति पारस के पास केंद्रीय मंत्री का पद है, जो उन्हें एक अलग पहचान देता है।चिराग पासवान के पास युवा नेतृत्व और करिश्माई व्यक्तित्व है।अगर भाजपा चिराग को ज्यादा महत्व देती है, तो पारस महागठबंधन का रुख कर सकते हैं।महागठबंधन में चिराग और पारस की संभावनाएं
अगर पारस या चिराग NDA छोड़ते हैं, तो राजद और कांग्रेस उन्हें अपने पाले में लाने की पूरी कोशिश करेंगे।लालू प्रसाद यादव पहले ही संकेत दे चुके हैं कि महागठबंधन में पासवान परिवार के लिए दरवाजे खुले हैं।तेजस्वी यादव की रणनीति दलित और यादव वोट बैंक को जोड़ने की होगी, जिससे भाजपा को नुकसान पहुंच सकता है।कांग्रेस भी दलित वोट बैंक को मजबूत करने के लिए चिराग या पारस को अपने साथ जोड़ सकती है।आगामी चुनाव पासवान परिवार के लिए निर्णायक होगा। भाजपा, जदयू और राजद सभी इस बात पर नजर रख रहे हैं कि पासवान वोट किस ओर जाएगा।पशुपति पारस के पास केंद्र में मंत्री पद की ताकत है।चिराग पासवान के पास युवा नेतृत्व और रामविलास पासवान की विरासत है।अगर भाजपा ने सही रणनीति नहीं अपनाई, तो महागठबंधन पासवान समुदाय को अपनी ओर आकर्षित कर सकता है।अब यह देखना दिलचस्प होगा कि बिहार की जनता किसे असली उत्तराधिकारी मानती है—चाचा पशुपति पारस या भतीजे चिराग पासवान?