एनसीईआरटी की 8वीं की किताब पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ अध्याय पर स्वतः संज्ञान; प्रतियां वापस लेने के आदेश

नई दिल्ली:

राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) की कक्षा आठ की सामाजिक विज्ञान की नई पाठ्यपुस्तक में शामिल ‘हमारे समाज में न्यायपालिका की भूमिका’ अध्याय को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर स्वतः संज्ञान लेते हुए सख्त रुख अपनाया और किताब की छपी प्रतियों को तत्काल प्रभाव से वापस लेने तथा सर्कुलेशन रोकने का आदेश दिया है।

सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ ने एनसीईआरटी के निदेशक को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। अदालत ने ऑनलाइन उपलब्ध प्रतियों को भी तुरंत हटाने के निर्देश दिए।

किताब में क्या लिखा था?

पाठ्यपुस्तक में न्यायपालिका के सामने आने वाली चुनौतियों का उल्लेख करते हुए भ्रष्टाचार और लंबित मामलों के भारी बोझ पर चर्चा की गई है।

भ्रष्टाचार पर टिप्पणी:

किताब में कहा गया कि न्यायपालिका के विभिन्न स्तरों पर लोगों को भ्रष्टाचार का सामना करना पड़ता है, जिससे गरीब और वंचित वर्ग के लिए न्याय तक पहुंच और कठिन हो जाती है। इसमें यह भी उल्लेख है कि न्यायाधीश आचार संहिता से बंधे होते हैं और जवाबदेही के लिए आंतरिक तंत्र तथा ‘केंद्रीकृत लोक शिकायत निवारण और निगरानी प्रणाली (CPGRAMS)’ जैसी व्यवस्थाएं मौजूद हैं। 2017 से 2021 के बीच 1600 से अधिक शिकायतें दर्ज होने का जिक्र भी किया गया।

साथ ही जुलाई 2025 में पूर्व मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई के बयान का हवाला देते हुए कहा गया कि भ्रष्टाचार की घटनाएं जनता के विश्वास को प्रभावित करती हैं, लेकिन पारदर्शी और निर्णायक कार्रवाई से भरोसा बहाल किया जा सकता है।

लंबित मामलों पर चिंता:

अध्याय में अदालतों में लंबित मामलों के भारी बैकलॉग को बड़ी चुनौती बताया गया है। इसके लिए न्यायाधीशों की कमी, जटिल प्रक्रियाएं और कमजोर बुनियादी ढांचे को जिम्मेदार ठहराया गया। विभिन्न अदालतों में लंबित मामलों के अनुमानित आंकड़े भी प्रस्तुत किए गए।

सुप्रीम कोर्ट की कड़ी प्रतिक्रिया

वरिष्ठ अधिवक्ताओं द्वारा मुद्दा उठाए जाने के बाद सीजेआई सूर्यकांत ने टिप्पणी की कि उन्हें इस संबंध में कई फोन और संदेश मिले हैं तथा उच्च न्यायालयों के न्यायाधीश भी इस सामग्री से आहत हैं। अदालत ने इसे न्यायपालिका को बदनाम करने की सोची-समझी कोशिश करार दिया।

एनसीईआरटी ने बिना शर्त माफी मांगने और विवादित अंश हटाने की बात कही, लेकिन अदालत ने कहा कि केवल माफी पर्याप्त नहीं है। निदेशक को यह स्पष्ट करना होगा कि इस तरह की सामग्री को शामिल करने का निर्णय कैसे लिया गया। अदालत ने यहां तक पूछा कि इसे अवमानना क्यों न माना जाए।

हालिया विवाद

पिछले कुछ समय में एनसीईआरटी की पाठ्यपुस्तकों में बदलाव और नए अध्यायों को लेकर कई बहसें हो चुकी हैं। यह ताजा विवाद शिक्षा, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और संस्थागत गरिमा के बीच संतुलन पर नई चर्चा छेड़ता है।

@MUSKAN KUMARI

NCRLOCALDESK
Author: NCRLOCALDESK

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