इस्लामाबाद/वॉशिंगटन।
अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच जारी तनाव के बीच पाकिस्तान ने खुद को एक संभावित मध्यस्थ के रूप में पेश किया है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने कहा है कि उनका देश ‘सार्थक और निर्णायक वार्ता’ की मेजबानी के लिए तैयार है। वहीं अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा इस प्रस्ताव को सकारात्मक संकेत मिलने के बाद यह पहल और चर्चा में आ गई है।
क्यों आगे आया पाकिस्तान?
विश्लेषकों के मुताबिक पाकिस्तान की यह पहल उसके संतुलित कूटनीतिक रिश्तों का नतीजा है। एक ओर उसके अमेरिका से मजबूत संबंध हैं, वहीं दूसरी ओर वह ईरान के साथ भी लंबे समय से जुड़ा रहा है। यही कारण है कि इस्लामाबाद को एक अपेक्षाकृत तटस्थ खिलाड़ी के रूप में देखा जा रहा है। खाड़ी देशों के विपरीत पाकिस्तान में अमेरिकी सैन्य अड्डे नहीं हैं, जिससे ईरान का भरोसा बढ़ सकता है।
क्या होगा फायदा?
रिपोर्ट्स के अनुसार, यदि पाकिस्तान इस संघर्ष को खत्म कराने में सफल रहता है, तो उसकी वैश्विक छवि में बड़ा बदलाव आ सकता है। लंबे समय से आतंकवाद से जुड़े आरोपों के कारण उसकी छवि प्रभावित रही है, जिसे वह ‘शांतिदूत’ बनकर सुधारना चाहता है। इसके अलावा, क्षेत्रीय स्थिरता से पाकिस्तान को आर्थिक लाभ भी मिल सकता है, खासकर तेल की कीमतों में कमी के रूप में।
घरेलू और क्षेत्रीय दबाव भी कारण
ईरान में लंबे युद्ध का असर पाकिस्तान तक फैलने का खतरा भी बना हुआ है। देश पहले से ही अफगान तालिबान के साथ तनाव और ऊर्जा संकट से जूझ रहा है। ऐसे में इस संघर्ष को समाप्त कराने की कोशिश पाकिस्तान के लिए ‘एक तीर से दो निशाने’ जैसी रणनीति मानी जा रही है।
विशेषज्ञों की राय
विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान की यह भूमिका असामान्य जरूर है, लेकिन उसके अमेरिका और ईरान दोनों से संबंध उसे एक भरोसेमंद मध्यस्थ बना सकते हैं। साथ ही, पश्चिम एशिया में वह फिर से एक अहम सहयोगी के रूप में उभरने की कोशिश कर रहा है।
कुल मिलाकर, पाकिस्तान की यह पहल सिर्फ कूटनीतिक नहीं, बल्कि रणनीतिक, आर्थिक और छवि सुधार से जुड़ी एक बड़ी चाल के रूप में देखी जा रही है।
@MUSKAN KUMARI






