नई दिल्ली।
इच्छामृत्यु की अनुमति मिलने के बाद जिंदगी की लंबी और पीड़ादायक जंग हार चुके हरीश राणा को बुधवार को नम आंखों से अंतिम विदाई दी गई। दिल्ली के ग्रीन पार्क स्थित शवदाह गृह में सुबह उनका अंतिम संस्कार किया गया। इस दौरान माहौल बेहद भावुक रहा और परिवार, रिश्तेदारों के साथ बड़ी संख्या में स्थानीय लोग उन्हें श्रद्धांजलि देने पहुंचे।
सुप्रीम कोर्ट से अनुमति मिलने के बाद अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में हरीश का निधन हुआ था। अंतिम संस्कार में सोसायटी के लोग भी बड़ी संख्या में शामिल हुए और इस कठिन समय में राणा परिवार के साथ खड़े नजर आए। हरीश के निधन की खबर से पूरे इलाके में सन्नाटा पसर गया था।
परिवार ने पहले गाजियाबाद के हिंडन घाट पर अंतिम संस्कार करने की इच्छा जताई थी, लेकिन मेडिकल कारणों और डॉक्टरों की सलाह पर दिल्ली में ही अंतिम संस्कार किया गया। पूरे सम्मान के साथ हरीश को विदाई दी गई।
13 साल तक चली दर्दनाक जंग
हरीश राणा की जिंदगी 2013 में हुए एक हादसे के बाद पूरी तरह बदल गई थी। चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी में सिविल इंजीनियरिंग के छात्र रहे हरीश अगस्त 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरकर गंभीर रूप से घायल हो गए थे। इसके बाद वह स्थायी वेजिटेटिव स्टेट में चले गए और 13 वर्षों तक मशीनों के सहारे जीवन जीते रहे।
परिवार ने हर संभव इलाज कराया, लेकिन कोई सुधार नहीं हुआ। अंततः बेटे के असहनीय दर्द को देखते हुए माता-पिता ने अदालत का दरवाजा खटखटाया और इच्छामृत्यु की अनुमति मांगी।
कोर्ट से मिली ‘सम्मानजनक मुक्ति’
दिल्ली हाई कोर्ट से याचिका खारिज होने के बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। मार्च 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया (इच्छामृत्यु) की अनुमति दे दी। 14 मार्च को हरीश को एम्स में भर्ती कराया गया, जहां डॉक्टरों ने धीरे-धीरे लाइफ सपोर्ट सिस्टम हटाया। 24 मार्च 2026 को उन्होंने अंतिम सांस ली।
हरीश राणा की कहानी न केवल एक व्यक्ति की पीड़ा की दास्तान है, बल्कि यह परिवार के संघर्ष, प्रेम और सम्मानजनक जीवन-मृत्यु के अधिकार पर भी गहरी बहस छोड़ गई है।
@MUSKAN KUMARI







