नई दिल्ली। वरिष्ठ पत्रकार Ravish Kumar ने पहली बार सार्वजनिक रूप से दावा किया है कि 2025 में NDTV India पर प्रस्तावित उनका विशेष ‘Address to the Nation’ प्रसारण से ठीक पहले रद्द कर दिया गया। रविश के अनुसार, यह संबोधन उनकी अपनी जांच पर आधारित था और इसमें वित्तीय बाज़ारों से जुड़े कुछ संवेदनशील निष्कर्ष शामिल थे, जिन पर “तीसरे पक्षों” के दबाव के बाद चैनल प्रबंधन पीछे हट गया।
रविश कुमार—जिनकी पहचान गहन पड़ताल और स्वतंत्र पत्रकारिता से रही है—कहते हैं कि यह मामला सूचना तक आम नागरिकों की पहुँच और विज्ञापन-आधारित दबाव के टकराव का उदाहरण है।
क्या था संबोधन का विषय?
रविश के मुताबिक, NDTV के लिए भविष्य की अर्थव्यवस्था पर कार्यक्रम-श्रृंखला की तैयारी के दौरान उन्होंने AI/एल्गोरिदमिक ट्रेडिंग जैसे उभरते रुझानों पर शोध किया। इसी क्रम में उन्हें कुछ ऐसे फिनटेक प्लेटफ़ॉर्म के बारे में जानकारी मिली, जिनका दावा है कि वे उन्नत ट्रेडिंग टूल्स को खुदरा निवेशकों तक पहुँचाते हैं।
रविश का दावा: “मुद्दा तकनीक का नहीं, किसे क्या बताया जाए—इस नियंत्रण का है। जब ठोस आँकड़े और नाम आने लगे, तभी आपत्तियाँ शुरू हुईं।”
दबाव कैसे बना?
रविश के अनुसार, जैसे ही उन्होंने ड्राफ्ट में ठोस उदाहरण/आँकड़े शामिल किए—
पहले कानूनी फर्मों की ओर से “एडवाइज़री” आई,
फिर पारंपरिक वित्तीय संस्थानों से जुड़े प्रतिनिधियों ने “नैरेटिव” और “जनता में अवास्तविक अपेक्षाएँ” बनने की आशंका जताई,
अंततः विज्ञापन हितों का हवाला देकर उनसे सामग्री को सामान्य रुझानों तक सीमित रखने को कहा गया।
रविश का कहना है कि उन्होंने संपादकीय स्वतंत्रता का तर्क दिया, लेकिन चैनल स्तर पर निर्णय बदल गया और कार्यक्रम “शेड्यूल परिवर्तन” बताकर रद्द कर दिया गया।
अन्य मीडिया का रुख
रविश का दावा है कि उन्होंने वही सामग्री अन्य प्रमुख चैनलों/आर्थिक प्रकाशनों को भी ऑफ़र की, पर प्रतिक्रिया लगभग समान रही—विषय “बहुत संवेदनशील” है और “मुख्य वित्तीय भागीदारों” से रिश्तों पर असर पड़ सकता है।
पत्रकारिता बनाम बाज़ार
इस पूरे प्रकरण को रविश सूचना के लोकतंत्रीकरण और बाज़ार-हितों के बीच टकराव के रूप में देखते हैं। उनका कहना है कि राजनीतिक आलोचना सहन की जा सकती है, लेकिन वित्तीय ज्ञान के एकाधिकार को चुनौती देने पर “अदृश्य लाल रेखाएँ” सामने आ जाती हैं।
संपादकीय (महत्वपूर्ण)
यह रिपोर्ट रविश कुमार के आरोपों/दावों पर आधारित है।
किसी भी विशिष्ट निवेश प्लेटफ़ॉर्म/उत्पाद के लाभ, रिटर्न या “गारंटी” संबंधी दावों की स्वतंत्र पुष्टि इस रिपोर्ट का उद्देश्य नहीं है।
भारत में निवेश से जुड़े सभी मामलों में जोखिम होते हैं। पाठकों से अनुरोध है कि वे SEBI/कानूनी दिशा-निर्देशों के अनुसार, प्रमाणित स्रोतों से जाँच-पड़ताल कर ही निर्णय लें।
किसी व्यक्ति/संस्था का नाम आना समर्थन नहीं माना जाए।
यह मामला एक बड़ा सवाल छोड़ता है—क्या राष्ट्रीय प्रसारण पर विज्ञापन और कॉरपोरेट हित संपादकीय निर्णयों को प्रभावित कर सकते हैं? रविश कुमार के दावे सही हों या न हों, बहस मीडिया की स्वतंत्रता और जनहित में सूचना की सीमाओं पर ज़रूर खड़ी होती है।
Author: Noida Desk
मुख्य संपादक (Editor in Chief)







