महाराष्ट्र : क्या दल बदल विरोधी कानून से बच पाएगी उद्धव सरकार, समझें अंकगणित…

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महाराष्ट्र के कैबिनेट मंत्री एकनाथ शिंदे ने करीब दो दर्जन से ज्यादा विधायकों को गुजरात ले जाकर शिवसेना नेतृत्व के खिलाफ ताल ठोंक दी है।

बताया जा रहा है कि वह पार्टी के संपर्क में नहीं हैं, ऐसे में महाराष्ट्र की उद्धव ठाकरे की सरकार मुश्किल में दिख रही है। कानून में कुछ ऐसी विशेष परिस्थितियों का उल्लेख किया गया है, जिनमें दलबदल पर भी सदस्य को अयोग्य घोषित नहीं किया जा सकता। दल बदल विरोधी कानून के मुताबिक, एक राजनीतिक दल को किसी अन्य राजनीतिक दल में या उसके साथ विलय की अनुमति है बशर्ते उसके कम से कम दो तिहाई विधायक विलय के पक्ष में हों।

मतलब, अगर किसी पार्टी से दो तिहाई सदस्य टूटकर दूसरी पार्टी में जाते हैं तो उनका पद बना रहेगा, यानी विधायक का पद बचा रहेगा, लेकिन अगर संख्या इससे कम होती है तो उन्हें विधायक के पद से इस्तीफा देना पड़ेगा। ऐसे में न तो दलबदल रहे सदस्यों पर कानून लागू होगा और न ही राजनीतिक दल पर। इसके अलावा सदन का अध्यक्ष बनने वाले सदस्य को इस कानून से छूट प्राप्त है।

महाराष्ट्र की बात की जाए तो विधानसभा में शिवसेना के पास 55 विधायक हैं, अगर बागी विधायक विलय करना चाहते हैं तो 55 का दो तिहाई, यानी 37 विधायकों को एक साथ दूसरी पार्टी में जाना होगा। अगर ऐसा होता है तो उन विधायकों पर कोई संवैधानिक कार्रवाई नहीं होगी। उनकी योग्यता बनी रहेगी।

जानें क्या है दल बदल विरोधी कानून

वर्ष 1985 में 52वें संविधान संशोधन के माध्यम से देश में ‘दलबदल विरोधी कानून’ पारित किया गया और इसे संविधान की दसवीं अनुसूची में जोड़ा गया। इस कानून का मुख्य उद्देश्य भारतीय राजनीति में दलबदल की कुप्रथा को समाप्त करना था। इस कानून के तहत किसी जनप्रतिनिधि को अयोग्य घोषित किया जा सकता है यदि:

इसलिए पड़ी जरूरत, समस्या जस की तस

समझें, महाराष्ट्र विधानसभा का अंकगणितः

महाविकास आघाड़ी –

शिवसेना – 55

राकांपा – 53

कांग्रेस – 44

(कुल विधायक – 152)

भाजपा – 106

छोटी पार्टियां एवं निर्दलीयः

बहुजन विकास आघाड़ी – 03

समाजवादी पार्टी – 02

प्रहार जनशक्ति पार्टी – 02

महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना – 01

जन सुराज्य पार्टी – 01

राष्ट्रीय समाज पक्ष – 01

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) – 01

निर्दलीय – 16

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भाजपा के अपने 106 विधायकों के साथ उसके समर्थक 06 निर्दलीय मिलाकर उसकी ताकत 112 तक पहुंचती है, लेकिन पिछले राज्यसभा चुनाव में उसे 123 विधायकों का समर्थन मिला। जबकि एक दिन पहले हुए विधान परिषद चुनाव में 134 विधायक उसके साथ नजर आए। जबकि महाराष्ट्र विधानसभा में सरकार बनाने के लिए 145 विधायकों की संख्या आवश्यक होती है। जितनी बड़ी संख्या में निर्दलीय शिवसेना के बागी नेता एकनाथ शिंदे के साथ नजर आ रहे हैं, यदि वे सभी भाजपा के साथ आ जाएं तो राज्य की राजनीति में बड़ी उलटफेर होते देर नहीं लगेगी।

Dainik Jagran

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